Saturday, December 22, 2012

घने कोहरे में -

कांपता सूरज , तलाशता है -

अलाव / कुछ इसी अंदाज में -

मानो ,कोई पदमनी

दर्पण तलाशती हो ,

या फिर -

न्याय , ढूंढ रहा हो

अपनी खोई / तुला

राजनीति के जंगल में

बेबस बिसुरता हुआ -

और / न्याय - मूर्ती ,

व्यस्त होँ

लेगपीस चबाने में ,

हलाल हो चुके /

न्याय का ,

क्योंकी ,मूर्ति पर सदा से -

चढ़ावा चढ़ाया जाता रहा है ,....

बेचारा सूरज ........

तलाश रहा है - अलाव ,

----- भोलानाथ त्यागी ,

49 /1 ,इमलिया परिसर

सिविल लाइंस , बिजनौर - 246701

मोबा - 09456873005

Monday, April 23, 2012

अपेक्षा
तुम मझे खून दो-
मैं तुम्हें आजादी दूंगा,
का उद्घोष आज
बदल गया है,।
लोकतन्त्र में खुलेआम-
धिक्कार एंव थू-थू हो रही है,
बेंचारा मतदाता/अपनी नियति देख
सिहर रहा है,
तुम हमें वोट दो-
हम तुम्हारा खून पियेगें,
की भावना लिये,
वोटों के खूंखवार शिकारी
व्यस्त हैं, घात लगाने में
और ‘सत्यम’ के ‘असत्य’-
सामने हैं,
तथाकथित बुद्धिजीवि का चिंतन,
भूखा बिलबिला रहा है,
बेसिक षिक्षा पोलियो ग्रस्त है
एंव उच्च षिक्षा-
लाला की तिजोरियों में
शीर्षासन कर रही है
षिक्षण सस्ंथान/
व्यवसायिक परिसर में-
बदल चुके हैं-
मंचो से मधुर स्वर में
गुनगुनाये जाते शब्द,
कविता मान लिये जाते हैं
जबकि ‘कविता’
गांव के जीर्ण-क्षीर्ण विद्यालय में
मिड-डे-मील अपनी थाली में संजोये
दलिये और खिचड़ी में तिरते
कीडे बीन रही है,
और यह कीडे/सारी व्यवस्था में
गिजबिजा रहें है
सठियाये लोकतन्त्र की यह-
उपलब्धि-,
गर्व का विषय है/अथवा शर्म का
इसमें उलझी
नेताजी सुभाष की भावना
का चीत्कार, बहरे हो चुके कानों तक
यदि सुनाई दे सका-
तो आज का दिन सार्थक होगा,
अन्यथा/कविता तो
पूर्वक्त भूखी ही सो जायेगी
अपनी निराषा के साथ
- भोलानाथ त्यागी

Sunday, January 8, 2012

लघु कथा



बलि का बकरा

- भोलानाथ त्यागी

चुनाव घोषित हो चुके थे , राजनीति चरम पर थी | सभी दल , अपनी -अपनी ढपली बजाने में व्यस्त थे | दल-बदल का मौसम , शवाब पर था |
और इस सब के बीच , जनता की छाती पर , मूँग दलने की एक बार फिर भरपूर तय्यारी थी |
तभी , रामदीन बोला -
"....... ससुर क्या जमाना आ गया है ? ......गिरगिट अपने चमत्कार दिखाने में , फिर इन्द्रधनुषी हो चले हैं ......लकिन इन नेताओं के सामने तो वह भी फेल हैं | "
तभी एक समाचार उछला -
" .......मूर्तियों पर पर्दा डाला जायेगा ....| "
रामदीन बुदबुदाया -
" ............पर्दा तो इन नेताओं की बुद्धि पर पहले ही पड़ चुका है ......जनहित पर पर्दा डाला जा चुका है ........
मूर्तियों पर पर्दा डालने से क्या होगा ....? पर्दा तो इस वाहियात राजनीति पर डालना चाहिए , ...साले...जनता को मूर्ख बनाते हैं |
.......अब इन पर्दों से कुछ नहीं होने वाला है .....जनता तो शैतानी पंजे की मजबूत गिरफ्त में छटपटा रही है , हमेशा कुरुर राजनीति की भेंट चढ़ती रहेगी
.....इस हांके में जनता, तो बलि का बकरा मात्र है .... | "
चुनावी मैदान में , शिकार की बिसात बिछ चुकी थी |
..........................................

भोलानाथ त्यागी
विनायकम , इमलिया परिसर ,
सिविल लाइन्स , बिजनौर - 246701
मोब - 09456873005