Saturday, December 22, 2012

घने कोहरे में -

कांपता सूरज , तलाशता है -

अलाव / कुछ इसी अंदाज में -

मानो ,कोई पदमनी

दर्पण तलाशती हो ,

या फिर -

न्याय , ढूंढ रहा हो

अपनी खोई / तुला

राजनीति के जंगल में

बेबस बिसुरता हुआ -

और / न्याय - मूर्ती ,

व्यस्त होँ

लेगपीस चबाने में ,

हलाल हो चुके /

न्याय का ,

क्योंकी ,मूर्ति पर सदा से -

चढ़ावा चढ़ाया जाता रहा है ,....

बेचारा सूरज ........

तलाश रहा है - अलाव ,

----- भोलानाथ त्यागी ,

49 /1 ,इमलिया परिसर

सिविल लाइंस , बिजनौर - 246701

मोबा - 09456873005

1 comment:

  1. प़भाव शाली व्यंग्यात्मक रचना है । बधाई ।

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