Sunday, July 31, 2011

लघु कथा

चूहे
रेलवे गोदाम के सामने पसरी पटरियों पर गेहूं के बोरों से लदे वैगन खडे़ थे। उनके ऊपर से ढका गया तिरपाल अलग हट चुका था। सुरक्षा व्यवस्था का कड ा प्रबन्ध था। राइफल थामे, सुरक्षाकर्मी, सामने खड े रेलवे अधिकारी से बतियाते लगा-

''.......अब क्या करें.... ससुरी महगाई ने कमाल ही कर दिया... घर का खर्च चलना मुच्च्िकल है... मामूली वेतन और घर भर का खर्च... खाना पहनना... बच्चों की पढ ाई... डाक्टर.............।''

''............ हां भाई... कहते तो ठीक हो, कमबखत... सरकार भी रोज मंहगाई बढ ा देती है... हद हो गयी अनाज भी कितना मंहगा है...जीना हराम है सबका...।'' रेलवे अधिकारी ने समर्थन किया था। सामने एक वेैंगन से गेहूं के बोरे उतारकर प्लेटफार्म पर बेदर्दी से रखे जा रहे थें। इस प्रक्रिया में ढेर सा गेहूं नीचे पटरियों पर बिखर रहा था। जिसे देख सुरक्षाकर्मी भावुक हो उठा-''......... कितना नुकसान होता है.. अनाज का चूहे खा जाते है......... बारिश में भीग जाता है........ बिखर जाता है...... यदि हम सब ध्यान दें तो..इससे मंहगाई पर असर पड ेगा...। ''रेलवे अधिकारी ने सिर हिलाया-.........''कहते तो ठीक हो।''

रात्रि में पांच-पांच बोरे गेहूं उस सुरक्षाकर्मी और अधिकारी के घर पहुंच चुका था। देच्च में चूहों की संखया के आंकड े सहज ही बढ गयें थे। - भोलानाथ त्यागी

लघु कथा

बरगद की छाया

बूढ़ा बरगद जर्जर हो चुका था, हवा का तेज झोंका,उसे कोई न कोई आघात दे ही जाता। फिर भी, उसका अस्तित्व, तपती दोपहरी में, चन्दन-सी द्राीतलता का आभास कराने हेतु पूर्ण समर्थ था। उसके नीचे, अब पथिक सुस्ता लेते। पक्षियों का कलरव, उस उपेक्षित एकान्त की नीरवता को, सहज ही भगं करता रहता।

एक दिन अचानक, समय के झोंको ने, आंधी का रूप धारण कर लिया-उसनें बरगद का जर्जर अस्तित्व चरमराने लगा, और देखते ही देखते, वह धराच्चायी हो गया। उस दिन, पक्षियों का कलरव द्राांत था, पथिक बेबस आगें बढ जाते। बरगद के घराच्चायी होने का, कम्पन संवेदनशील धरती में, दूर तक महसूस हुआ था।

उस स्थान पर, बरगद की छाया की कल्पना ही, एक अव्यक्त द्राीतलता दे जाती, पथिक, अब भी वहां सहज ही ठिठक जाते, तथा पल भर को पक्षी, अनायास वहां चहचहाने लगते। बरगद की छाया, एक अतीत बन चुकी थी, लेकिन उस स्थान की पहचान, अभी भी बरगद से जुड ी थी। बरगद-हां, कतिपय मानवीय व्यक्तित्व भी बरगद की छाया का ही पर्याय होते हैं-जो साक्षात्‌ न रहकर भी, अपना अस्तित्व बनाये रखते हैं।

- भोलानाथ त्यागी

लघु कथा

पीवड़ा
रेत की छाती पर पड ी लकीर,ें हवा से बन बिगड रही थीं। राजमार्ग के किनारे, इसी राजस्थानी परिवेच्च में, ढाबे पर अनेकों ट्रक एक कतार में खड े थे। ड्राइवर/क्लीनर अपने विच्चिद्गट अंदाज में बैठे बतिया रहे थे। एक स्थानीय समाचार पत्र का पृद्गठ रेतीली हवा के झोकों से रह.रह कर, सामने टेबिल पर पड ा फडफड ा रहा था। समाचार का द्राीर्पक .'पीवड ा ने तीन व्यक्तियों को मौत की नींद सुलाया' पढ कर एक पाठक ने कहा.'........सा...े...ला...पीवड ा भी कैसा दुच्च्मन है........सोते आदमी की छाती पर रात को चुपचाप बैठ जाता है....... सांस के द्वारा सारा जहर आदमी के अन्दर पहुंचा देता है...........सांप है या मौत का फरिच्च्ता...?।'
यह सुन कर एक अन्य व्यक्ति सहज ही चहक उठा-'क्यों साहब-पीवड ा तो आखिर सांप है...... और सोते आदमी की छाती पर बैठता है.......जबकि हमारे समाज में तो आजकल अनेकों पीवड ा जागते आदमी की छाती पर बैठे हैं......आरक्षण का पीवड ा.......साम्प्रदायिकता का पीवड ा.........भ्रद्गट्राचार का पीवड ा........ये सब अपना जहर घोल रहे हैं..........और आप रेगिस्तान के मामूली से सांप, पीवड ा की पीड ा से त्रस्त हैं'।
इस कथन से पीवड ा का भय, और भी अधिक व्याप्त हो गया था।
- भोलानाथ त्यागी

Saturday, July 30, 2011

कविता

माँ
माँ- आज भी टहलती है,
रात भर/आंगन में-
चादंनी बन,
रसोई में रची-बसी है माँ-
बघार की गंध के साथ,
जब कभी हो जाता है, जुखाम/तो-
तुलसी की पत्ती और काली मिर्च वाली-
चाय में/माँ का- ममतामय चेहरा-
थिरकने लगता है,
जब कभी भी मैनें डाटां/नन्हे बेटे विनायक
को-
माँ ने- मुझे डाटा था-
क्योंकि माँ/ जब दादी बन जाती है-
तो ममता- अनायास बढ़ जाती है उसकी-
लगता है हर माँ-
देखती है, अपने बेटे को/ जीवन भर-
चदंन की गंध बन-
अगरबत्ती के धुऐं की तरह,
व्याप्त होती है- माँ-
हर दिच्चा मे/हर समय-
मां-सार्वमौम सत्य है,
प्रकृति का/जीवन धड कन का-
बघार की सौंधी महक-
और चदंन गंध सा,
कोमल अहसास है-
माँ।
बोनसाई संस्कृति
हमारा देच्च/संस्कृति-
अपनी अलग पहचान रखते थे,
सनातन काल से-
विच्च्वगुरु की गरिमा से विभूद्गिात-
आज अलंकृत है-
राजनीति के, गुरु घंटालो से,
सिद्वान्त और नैतिकता के
कंकालो से,
संस्कृति का बोनसाईकरण-
बलात, कर दिया गया है,
गमलों में उग रहे हैं-
वटवृक्ष,
सूत के कच्चे धागे-औ-
पीपल को छांव
चौपाल/हुक्का औ-गांव
इनका सैट, करोड ों रुपयेेेेेेेे खर्चकर
लगाया जाता है।
तब थिरकती है, नगंई-
बस, फिल्म हिट हो जाती है,
राद्गट्रभक्ति, 'गदर' का पर्याय बन-
चिघांड रही है/और सत्ता-
गगन विहार कर/चिरौरी में लगी है-
मवालियों की, लेकिन
बोनसाई वटवृक्ष, फिर भी
मुस्करा रहा है, क्योंकि-
कुछ भी सही/ है तो वटवृक्ष ही-
भले ही, बोनसाई हो.......।,
- भोलानाथ त्यागी

Wednesday, July 27, 2011

लघु कथा

समीकरण

विच्च्वविधालय की परीक्षाएं सम्पन होने के पच्च्चात, परीक्षा- परिणाम के विद्गाय में छात्र/छात्राओं मे स्वाभाविक जिज्ञासा बनी थी। राजीव ने अपनी चिन्ता को अभिव्यक्ति प्रदान करते हुए कहा था...... 'क्या बताएं इस बार तो काफी कठिन स्वाल आये थे, पास हो जायें, बस इतना ही बहुत है-।

..... क्यों चिंता करते हो यार, अपुन के नम्बर तो चकाचक आयेंगे- इस बार भी परीक्षा की कापियां कहां-कहां जंचने गई हैं... सारी जानकारी कर ली है- अटैची टूर करना है- और बस चाहो तो तुम भी साथ चलना-।

घनच्च्याम ने राजीव को आच्च्वस्त किया था।

इस आच्च्वस्ति के साथ ही च्चिक्षा की सार्थकता उजागर हो उठी थी। परीक्षा परिणाम का यह समीकरण अपने औचित्य पर, स्वयं एक प्रच्च्न-चिन्ह बन गया लगता था।

''पिकनिक''
पतित पावनी गंगा अपनी अविराम गति से बह रही थी। पिकनिक मनाने आई पार्टी जल-क्रीडा मे मग्न थे। सुरा प्रेमियों ने अपनी बोतलें ठडें पानी में, पत्थरों से टिकाकर सहेज दी। सामने थोड़ी दूरी पर एक युवती अपने बच्चे के साथ गंगा स्नान में व्यस्त थी। अनायास अबोध बच्चे का हाथ नहाते समय छूट गया-वह डूबने लगा और माँ की पुकार से पिकनिक पार्टी का ध्यान भंग हो गया।

बच्चा बचा लिया गया। माँ ने अपने गीले आंचल में उसे छिपा लिया, वह हाथ जोड कर जीवनदाता का धन्यवाद ज्ञापित कर रही थी। पिकनिक पार्टी का ध्यान युवती के मदमाते यौवन पर जा टिका, बोतल में बंद सुरा, प्रेमियों के पेट में कभी की उतर चुकी थी। टेपरिकार्डर पर पॉप संगीत बज रहा था, तभी एक सुझाव उभरा- ''........... अमा यार........... सामने देख........... क्या गजब चीज हैं.... पिकनिक रंगीन हो जाएगी... बस जरा सी....हिम्मत की बात है....।''

और, युवती, क्रूर बलात्कार का च्चिकार बन गई। बच्चा, रेत पर पड ा, बरबस रोता रहा। जीवनदाता, सहित, संपूर्ण मित्र मंडली अपना धन्यवाद, ग्रहण कर चुकी थी। पतित पावनी, मूक बनी पूर्ववत बहती रही।

-भोलानाथ त्यागी

Tuesday, July 26, 2011

कविता

रावण का साकेत
पुरवाई, बादल और वद्गर्ाा/की कल्पना
मरूस्थल की तपन में,
लगती है सुखद-
कुछ ऐसे ही,ज्यों-
आजकल,रामराज्य की बात,
की जा रही हो, लेकिन आज-
साकेत तक रावणराज्य पसर गया है,
और बेचारा राम,
राजनीति की बिसात का,
एक मामूली प्यादा भर रह गया है,
जिस के भरोसे-
द्राह औ मात हेतु, चालें चली जाती हैं,
और बेचारी जनता/पूर्ववत-
छली जाती है,
राजराज्य का राजपथ-
लोकतन्त्र
की पगडन्डी में/कहीं-
गहरे-गुम हो गया है,
और बेचारा राम-
रामू बन, एके सैतांलिस थामे-
संसद के मुखय द्वार पर,
पहरा दे रहा है/और अंदर बैठे ढेरों रावण-
लोकतन्त्र से बलात्कार सम्पन्न-
होने की खुच्ची में,
मेजें थपथपा रहें हैं।

कविता


कैक्टस
राजनीति के जगंल में
उग रहें है-
मधु कोड़ा/
नरेन्द्र मोदी की मुस्कान लिये,
मायावी द्राान की मूर्तियों से सजे-
जुरासिक पार्क में विचरते,
डायनासोर रूपी भारी/भरकम-
नेतृत्व,
अपनी उगंली में पड ी, हीरे की अगूंठी-
सहला रहें हैं,
और देच्च का भविद्गय
अध्यापक/टाट- पट्टी विहीन-
विधालयों में,
मिड-डे-मील, भकोस रहा है
उसमें गिजबिजाते कीड े
अब सारी व्यवस्था में फैल गये हैं,
कैक्टस-
फूलों से भर गया है,
कैक्टस के फूूलों का यह-
समीकरण/च्चायद-
कैक्टस ही समझा पाये।

Monday, July 25, 2011

कविता

प्रच्च्न

पानी/आज स्वंय-
पानी-पानी हो रहा हैं,
आंख का पानी/चढ़ गया हैं भेंट-
उपभोक्ता-संस्कृति की
बलि वेदी पर,
आंख का पानी सूख गया हैं
संवेदन द्राून्य है/वर्तमान सोच-
समन्दर खुद प्यासा है
चातक बनी है आच्चा,
आज भी/चारों और-
पसरा है एक रेगिस्तान,
दिगम्बर देह का सच-
थिरक रहा है/कला और सहित्य-
के नाम पर,
अब लगता है-
दो चुल्लू भी नहीं बचा है,
पानी/जो द्राायद काम आता-
कहावत के/सार्थक होने मे,
पानी-स्वंय बन गया है-यक्ष,
और कर रहा है प्रच्च्न-
आपने कभी/कहीं-
पानी देखा है ?

बेचारा मुर्गा

भिनसारे जब-
बसंवारी के उस पार-,
जगंली मुर्गा बांग देता है-
सुरमई आसमान की गोद में
तब/सूरज अंगडाई लेने लगता है,
बज उठती हैं-मन्दिर में घन्टियां,
और मस्जिद से सुनाई देने लगता है-
अजान का स्वर,
गुरुद्वारे में सबद-कीर्तन होने लगता है
और जाग जाता है-
चर्च भी,
लेकिन आज तक-
किसी ने भी,
उस मुर्गे का मजहब नहीं पूछा है,
बांग की भाद्गाा क्या है ?
नही जाना है,
बसंवारी से गुजरती तेज हवा-
बन जाती है, संगीत-
और मुर्गा नाचने ने लगता हैं,
द्रााम होने तक/जब-
अंधियारे की चादर ओढ -
सूरज-चला जाता है सोने,
तो, उसे जगाने के लिये-
जगंली मुर्गा
रात भर बैचेन रहता है,
बेचारा मुर्गा।
- भोलानाथ त्यागी

कविता


अपेक्षा
तुम मझे खून दो-
मैं तुम्हें आजादी दूंगा,
का उद्‌घोद्गा/आज
बदल गया है,।
लोकतन्त्र में खुलेआम-
धिक्कार एंव थू-थू हो रही है,
बेंचारा मतदाता/अपनी नियति देख
सिहर रहा है,
तुम हमें वोट दो-
हम तुम्हारा खून पियेगें,
की भावना लिये,
वोटों के खूंखवार च्चिकारी
व्यस्त हैं, घात लगाने में
और 'सत्यम्‌' के 'असत्य'-
सामने हैं,
तथाकथित बुद्धिजीवि का चिंतन,
भूखा बिलबिला रहा है,
बेसिक च्चिक्षा पोलियो ग्रस्त है
एंव उच्च च्चिक्षा-
लाला की तिजोरियों में
द्राीद्गर्ाासन कर रही है
च्चिक्षण सस्ंथान/
व्यवसायिक परिसर में-
बदल चुके हैं-
मंचो से मधरु स्वर में
गुनगुनाये जाते द्राब्द,
कविता मान लिये जाते हैं
जबकि 'कविता'
गांव के जीर्ण-च्चीर्ण विधालय में
मिड-डे-मील/अपनी थाली में संजोये
दलिये और खिचड़ी में तिरते
कीड े बीन रही है,
और यह कीड े/सारी व्यवस्था में
गिजबिजा रहें है
सठियाये लोकतन्त्र की यह-
उपलब्धि-,
गर्व का विद्गाय है/अथवा द्रार्म का
इसमें उलझी
नेताजी सुभा की भावना
का चीत्कार, बहरे हो चुके कानों तक
यदि सुनाई दे सका-
तो आज का दिन सार्थक होगा,
अन्यथा/'कविता' तो
पूर्वक्त भूखी ही सो जायेगी
अपनी निराच्चा के साथ
- भोलानाथ त्यागी

लघु कथा

गुण्डागर्दी
'क्यो बे,...... क्या नाम है तेरा ? 'दरोगा जी ने अपनी भयंकर मूछे मरोड़ते हुए पूछा था।

उत्तर मिला-'हजूर,..... गयादीन कहते हैं !

'गयादीन की तलाच्ची में, दरोगा जी ने बीस रूपय,े बरामद किये और फिर सवाल दागा -........ 'हरामखोर, बता, ये रुपये कहां से आये, गुण्डागर्दी की कमाई खाता है.......।'

सवाल के साथ ही, बूट की एक जोरदार ठोकर-गयादीन के पेट पर लगी थी, उसने रिरियाते हुए कहा-.........'हजूर, सच जानिये,....... दो दिन की मजदूरी के रुपये लाया था, गुण्डागर्दी नही करता....।'

दरोगा जी ने बीस रुपये अपनी जेब के हवाले कर, गयादीन को उपदेच्चा-'..........चल भाग, आगे से गुण्डागर्दी मत करना,..... साला........... बदमाच्च...।'