चूहे
रेलवे गोदाम के सामने पसरी पटरियों पर गेहूं के बोरों से लदे वैगन खडे़ थे। उनके ऊपर से ढका गया तिरपाल अलग हट चुका था। सुरक्षा व्यवस्था का कड ा प्रबन्ध था। राइफल थामे, सुरक्षाकर्मी, सामने खड े रेलवे अधिकारी से बतियाते लगा-
''.......अब क्या करें.... ससुरी महगाई ने कमाल ही कर दिया... घर का खर्च चलना मुच्च्िकल है... मामूली वेतन और घर भर का खर्च... खाना पहनना... बच्चों की पढ ाई... डाक्टर.............।''
''............ हां भाई... कहते तो ठीक हो, कमबखत... सरकार भी रोज मंहगाई बढ ा देती है... हद हो गयी अनाज भी कितना मंहगा है...जीना हराम है सबका...।'' रेलवे अधिकारी ने समर्थन किया था। सामने एक वेैंगन से गेहूं के बोरे उतारकर प्लेटफार्म पर बेदर्दी से रखे जा रहे थें। इस प्रक्रिया में ढेर सा गेहूं नीचे पटरियों पर बिखर रहा था। जिसे देख सुरक्षाकर्मी भावुक हो उठा-''......... कितना नुकसान होता है.. अनाज का चूहे खा जाते है......... बारिश में भीग जाता है........ बिखर जाता है...... यदि हम सब ध्यान दें तो..इससे मंहगाई पर असर पड ेगा...। ''रेलवे अधिकारी ने सिर हिलाया-.........''कहते तो ठीक हो।''
रात्रि में पांच-पांच बोरे गेहूं उस सुरक्षाकर्मी और अधिकारी के घर पहुंच चुका था। देच्च में चूहों की संखया के आंकड े सहज ही बढ गयें थे। - भोलानाथ त्यागी
