Sunday, January 8, 2012

लघु कथा



बलि का बकरा

- भोलानाथ त्यागी

चुनाव घोषित हो चुके थे , राजनीति चरम पर थी | सभी दल , अपनी -अपनी ढपली बजाने में व्यस्त थे | दल-बदल का मौसम , शवाब पर था |
और इस सब के बीच , जनता की छाती पर , मूँग दलने की एक बार फिर भरपूर तय्यारी थी |
तभी , रामदीन बोला -
"....... ससुर क्या जमाना आ गया है ? ......गिरगिट अपने चमत्कार दिखाने में , फिर इन्द्रधनुषी हो चले हैं ......लकिन इन नेताओं के सामने तो वह भी फेल हैं | "
तभी एक समाचार उछला -
" .......मूर्तियों पर पर्दा डाला जायेगा ....| "
रामदीन बुदबुदाया -
" ............पर्दा तो इन नेताओं की बुद्धि पर पहले ही पड़ चुका है ......जनहित पर पर्दा डाला जा चुका है ........
मूर्तियों पर पर्दा डालने से क्या होगा ....? पर्दा तो इस वाहियात राजनीति पर डालना चाहिए , ...साले...जनता को मूर्ख बनाते हैं |
.......अब इन पर्दों से कुछ नहीं होने वाला है .....जनता तो शैतानी पंजे की मजबूत गिरफ्त में छटपटा रही है , हमेशा कुरुर राजनीति की भेंट चढ़ती रहेगी
.....इस हांके में जनता, तो बलि का बकरा मात्र है .... | "
चुनावी मैदान में , शिकार की बिसात बिछ चुकी थी |
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भोलानाथ त्यागी
विनायकम , इमलिया परिसर ,
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