शोध कार्य --
बीसवीं शती के हिंदी साहित्य संवर्धन में जनपद बिजनौर का योगदान --
डॉ उषा त्यागी-----
‘बिजनौर जनपदीय रचनाकारऔर उनका सर्वेक्षणात्मक परिचय
बीसवीं शती के हिंदी साहित्य संवर्धन में जनपद बिजनौर का योगदान --
डॉ उषा त्यागी-----
‘बिजनौर जनपदीय रचनाकारऔर उनका सर्वेक्षणात्मक परिचय
अजय जैन
अजय जैन का जन्म 13 नवम्बर सन् 1964 को नजीबाबाद (बिजनौर) में हुआ। आपके पिता का नाम श्री राजेन्द्र कुमार जैन एवं माता का नाम श्रीमती लता जैन है। अजय जैन की शिक्ष एम0काम0, बी0एड0 तक हुई तथा सम्प्रति आप सर्राफा व्यवसाय से जुडे़ हैं। दैनिक जागरण मेरठ संस्करण के आप प्रतिनिधि हैं तथा पत्रकारिता के साथ ही साथ साहित्य सृजन में पूर्ण मनोयोग से जुटे हैं।
‘सन्नाटें मंे गूज‘ तथा ‘हर गीत तुम्हारे नाम‘ कविता संग्रह में आपकी रचनाओं को संकलित किया गया है। राजपुर नवादा (बिजनौर) के दुष्यंत कुमार त्यागी संस्थान द्वारा आपके साहित्य सृजन पर दुष्यंत एवार्ड प्रदान किया जा चुका है। साहित्यिक संस्था ‘कृति‘ के अध्यक्ष एवं ‘परिचय‘ संस्था के कार्यक्रम संयोजक के रूप में अजय जैन पर्याप्त चर्चित हो चुके हैं। आकाशवाणी से रचनाओं का प्रसारण होता रहा हैं। उनकी एक कविता का उदाहरण प्रस्तुत है-
अवसादों के काले बादल
सतरंग कर जा होली में
प्रेम के रंग से रंगकर कोई
गीत सुना जा होली में प्रीत रीत के भाव ह्रदय में
आज जगा जा होली में
तन भीगे, मन भीगे ऐसा
रंग जा, आजा होली में।
अजय जैन का जन्म 13 नवम्बर सन् 1964 को नजीबाबाद (बिजनौर) में हुआ। आपके पिता का नाम श्री राजेन्द्र कुमार जैन एवं माता का नाम श्रीमती लता जैन है। अजय जैन की शिक्ष एम0काम0, बी0एड0 तक हुई तथा सम्प्रति आप सर्राफा व्यवसाय से जुडे़ हैं। दैनिक जागरण मेरठ संस्करण के आप प्रतिनिधि हैं तथा पत्रकारिता के साथ ही साथ साहित्य सृजन में पूर्ण मनोयोग से जुटे हैं।
‘सन्नाटें मंे गूज‘ तथा ‘हर गीत तुम्हारे नाम‘ कविता संग्रह में आपकी रचनाओं को संकलित किया गया है। राजपुर नवादा (बिजनौर) के दुष्यंत कुमार त्यागी संस्थान द्वारा आपके साहित्य सृजन पर दुष्यंत एवार्ड प्रदान किया जा चुका है। साहित्यिक संस्था ‘कृति‘ के अध्यक्ष एवं ‘परिचय‘ संस्था के कार्यक्रम संयोजक के रूप में अजय जैन पर्याप्त चर्चित हो चुके हैं। आकाशवाणी से रचनाओं का प्रसारण होता रहा हैं। उनकी एक कविता का उदाहरण प्रस्तुत है-
अवसादों के काले बादल
सतरंग कर जा होली में
प्रेम के रंग से रंगकर कोई
गीत सुना जा होली में प्रीत रीत के भाव ह्रदय में
आज जगा जा होली में
तन भीगे, मन भीगे ऐसा
रंग जा, आजा होली में।
मुकेश ‘नादान‘
मुकेश ‘नादान‘ का जन्म 5 नवम्बर सन् 1964 को नजीबाबाद में हुआ। आपके पिता का नाम श्री लक्ष्मण सिंह वर्मा तथा माता का नाम श्रीमती सावित्री देवी है। मुकेश ‘नादान‘ की शिक्षा स्नातक स्तर तक सम्पन्न हुई। तत्पश्चात आप, नजीबाबाद में ही व्यापार एवं प्रकाशन संस्थान से जुडें़ हैं।
हास्य व्यंग्य आपकी प्रमुख विधा है तथा इसके ही चित्रकला में भी गहन अभिरूचि है। ‘आओ हंसकर देखे‘ तथा ‘जब भी कुछ कहना चाहा‘ शीर्षक काव्य फोल्डर के अतिरिक्त मुकेश ‘नादान‘ साहित्य दर्पण‘ शीर्षक सचित्र काव्य फोल्डर के माध्यम से अपनी प्रतिभा का एक उदाहरण हैं।
हास्य-व्यंग्य कविता का एक उदाहरण दृष्टव्य है-
हमने मौहल्ले के
नत्थू/फत्तू को-
इकठ्ठा कर
एक सम्मान समिति बनाई थी,
हर महीने अपना सम्मान करवा
अपनी समिति से-
काम चला रहे है,
वर्षाें पहले एक शाॅल खरीदी थी-
कभी नत्थू से/कभी फत्तू से
उसे अपने ऊपर डलवा रहे हैं
यह क्रम जारी रहेगा-
हमारे ऊपर
अन्तिम चादर चढ़ने तक।
मुकेश ‘नादान‘ का जन्म 5 नवम्बर सन् 1964 को नजीबाबाद में हुआ। आपके पिता का नाम श्री लक्ष्मण सिंह वर्मा तथा माता का नाम श्रीमती सावित्री देवी है। मुकेश ‘नादान‘ की शिक्षा स्नातक स्तर तक सम्पन्न हुई। तत्पश्चात आप, नजीबाबाद में ही व्यापार एवं प्रकाशन संस्थान से जुडें़ हैं।
हास्य व्यंग्य आपकी प्रमुख विधा है तथा इसके ही चित्रकला में भी गहन अभिरूचि है। ‘आओ हंसकर देखे‘ तथा ‘जब भी कुछ कहना चाहा‘ शीर्षक काव्य फोल्डर के अतिरिक्त मुकेश ‘नादान‘ साहित्य दर्पण‘ शीर्षक सचित्र काव्य फोल्डर के माध्यम से अपनी प्रतिभा का एक उदाहरण हैं।
हास्य-व्यंग्य कविता का एक उदाहरण दृष्टव्य है-
हमने मौहल्ले के
नत्थू/फत्तू को-
इकठ्ठा कर
एक सम्मान समिति बनाई थी,
हर महीने अपना सम्मान करवा
अपनी समिति से-
काम चला रहे है,
वर्षाें पहले एक शाॅल खरीदी थी-
कभी नत्थू से/कभी फत्तू से
उसे अपने ऊपर डलवा रहे हैं
यह क्रम जारी रहेगा-
हमारे ऊपर
अन्तिम चादर चढ़ने तक।
किरणपाल सिंह ‘मयंक‘
श्री मांगे सिंह एवं स्व0 श्रीमती शान्ति देवी के पुत्र रत्न किरणपाल सिंह ‘मयंक‘ का जन्म, दिनांक 10 मई सन् 1967 को ग्राम गडीना जिला मेरठ में हुआ। आपकी शिक्षा, एम0ए0, बी0एड0 तक सम्पन्न हुई। सम्प्रति मूर्ति देवी सरस्वती इन्टर कालिज, नजीबाबाद में सहायक अध्यापक हैं।
किरणपाल सिंह ‘मयंक‘ भारती साहित्य कला संस्कृति संस्थान, नजीबाबाद से सक्रियता से जुडे़ हैं तथा स्थानीय कवि गोष्ठी में भाग लेते रहे हैं। आपने साहित्य को विभिन्न विधाओं में सृजन किया है। लेकिन काव्य आपकी प्रमुख एवं प्रिय विधा रही है। गीत, गजल व दोहों के माध्यम से, मयंक को अपनी अभिव्यक्ति सार्थक लगती है।
आत्म प्रचार से दूर, बिना शोर-शराबे के साहित्य की अपनी अनवरत सेवा देने वाला यह कवि अभी तक किसी संकलन में प्रकाशित नहीं हुआ हैं। कतिपय रचनाऐं स्फुट रूप में प्रकाश में आ चुकी हैं, लेकिन अपनी रचनाओं के माध्यम से यह कवि आश्वस्त करता है कि साहित्य सृजन के द्वारा उसकी भावपूर्ण अभिव्यक्ति पाठक और श्रोता को झकझोरने में सफल है।
श्री मांगे सिंह एवं स्व0 श्रीमती शान्ति देवी के पुत्र रत्न किरणपाल सिंह ‘मयंक‘ का जन्म, दिनांक 10 मई सन् 1967 को ग्राम गडीना जिला मेरठ में हुआ। आपकी शिक्षा, एम0ए0, बी0एड0 तक सम्पन्न हुई। सम्प्रति मूर्ति देवी सरस्वती इन्टर कालिज, नजीबाबाद में सहायक अध्यापक हैं।
किरणपाल सिंह ‘मयंक‘ भारती साहित्य कला संस्कृति संस्थान, नजीबाबाद से सक्रियता से जुडे़ हैं तथा स्थानीय कवि गोष्ठी में भाग लेते रहे हैं। आपने साहित्य को विभिन्न विधाओं में सृजन किया है। लेकिन काव्य आपकी प्रमुख एवं प्रिय विधा रही है। गीत, गजल व दोहों के माध्यम से, मयंक को अपनी अभिव्यक्ति सार्थक लगती है।
आत्म प्रचार से दूर, बिना शोर-शराबे के साहित्य की अपनी अनवरत सेवा देने वाला यह कवि अभी तक किसी संकलन में प्रकाशित नहीं हुआ हैं। कतिपय रचनाऐं स्फुट रूप में प्रकाश में आ चुकी हैं, लेकिन अपनी रचनाओं के माध्यम से यह कवि आश्वस्त करता है कि साहित्य सृजन के द्वारा उसकी भावपूर्ण अभिव्यक्ति पाठक और श्रोता को झकझोरने में सफल है।
दिनेश खन्ना
दिनेश खान्ना का जन्म 30 नवम्बर सन् 1968 को नजीबाबाद में हुआ। आपके पिता का नाम श्री कृष्ण कुमार खन्ना एवं माता का नाम स्व0 श्रीमती प्रभा खन्ना हैं। हाई स्कूल स्तर तक शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त आप व्यवसाय से जुड़ गये।
नजीबाबाद की साहित्यिक संस्थाओं यथा-अभिव्यक्ति, युग हस्ताक्षर, परिचय, हस्ताक्षर आदि में दिनेश खन्ना की सक्रिय भागीदारी बनी रहती है। साहित्य के संदर्भ में काव्य में आपकी गहन रूचि है। हिन्दी गजल के माध्यम से, दिनेश खन्ना ने अभिव्यक्ति की है। एक उदाहरण प्रस्तुत है-
ता उम्र तेरी आँख का काजल न बन सका
नजरों से मुझको आपने, आखिर गिरा दिया
ठोकर लगाई आपने, और हँस के चल दिये
तुमने मेरी वफा का ये अच्छा सिला दिया
पूछा जो मैंने उससे, कहाँ पर है जिन्दगी
उसने तुम्हारे गाँव का रस्ता दिखा दिया।
×××
सबकी तमाम कोशिशें, बेकार हो गई
उसने मुझे मनाया, तभी हो गई गजल
जिसने तमाम उम्र संवरने नहीं दिया
वो दर्द याद आया, तभी हो गई गजल।
दिनेश खन्ना का शब्द-शिल्प-उनकी गजल, कविता, मुक्तक में-पाठक/श्रोता को झकझोरता है।
दिनेश खान्ना का जन्म 30 नवम्बर सन् 1968 को नजीबाबाद में हुआ। आपके पिता का नाम श्री कृष्ण कुमार खन्ना एवं माता का नाम स्व0 श्रीमती प्रभा खन्ना हैं। हाई स्कूल स्तर तक शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त आप व्यवसाय से जुड़ गये।
नजीबाबाद की साहित्यिक संस्थाओं यथा-अभिव्यक्ति, युग हस्ताक्षर, परिचय, हस्ताक्षर आदि में दिनेश खन्ना की सक्रिय भागीदारी बनी रहती है। साहित्य के संदर्भ में काव्य में आपकी गहन रूचि है। हिन्दी गजल के माध्यम से, दिनेश खन्ना ने अभिव्यक्ति की है। एक उदाहरण प्रस्तुत है-
ता उम्र तेरी आँख का काजल न बन सका
नजरों से मुझको आपने, आखिर गिरा दिया
ठोकर लगाई आपने, और हँस के चल दिये
तुमने मेरी वफा का ये अच्छा सिला दिया
पूछा जो मैंने उससे, कहाँ पर है जिन्दगी
उसने तुम्हारे गाँव का रस्ता दिखा दिया।
×××
सबकी तमाम कोशिशें, बेकार हो गई
उसने मुझे मनाया, तभी हो गई गजल
जिसने तमाम उम्र संवरने नहीं दिया
वो दर्द याद आया, तभी हो गई गजल।
दिनेश खन्ना का शब्द-शिल्प-उनकी गजल, कविता, मुक्तक में-पाठक/श्रोता को झकझोरता है।
प्रमोद कुमार जैन
आपका जन्म 30 जुलाई सन् 1970 को मुज्फ्फरनगर (उ0प्र0) में हुआ। आपके पिता का नाम श्री हरिकिशन एवं माता का नाम सोहनवीरी है। प्रमोद कुमार की शिक्षा एम0एस0सी0, बी0एड0 उपाधि स्तर तक सम्पन्न हुई। सम्प्रति, मूर्ति देवी सरस्वती इन्टर कालेज, नजीबाबाद में अध्यापक के रूप में कार्यरत हैं।
हिन्दी साहित्य में प्रमोद कुमार ‘प्रेम‘ ने गीत, गजल के माध्यम से अपनी रचनात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। भारती साहित्य कला संस्कृति संस्थान, नजीबाबाद से आपका सक्रिय संबध है। आपकी रचनाओं स्फुट प्रकाशन, प्रसारण हुआ है। सामाजिक विसंगतियों पर तथा व्यवस्था के तौर-तरीके पर प्रमोद कुमार प्रेम ने अपनी रचनाओं द्वारा करारा कटाक्ष किया है। उदाहरणार्थ, उनकी अग्रांकित पंक्तियाँ
‘ऐ वतन, मेरे प्यारे वतन
परमाणु बम बना
हम कितनी उन्नति कर गये
ये ना हमने सोचा कभी
भूख से बच्चे कितने मर गये
ऊँचाइयों पर संसार की
बस रहे तेरा नाम
ऐ वतन, मेरे प्यारे वतन........।
प्रमोद कुमार प्रेम में साहित्यिक संदर्भ में अनन्त सम्भावनाएँ, करवट बदलती लगती है। लेकिन शब्द विन्यास, भाषा-शैली में, रचनाकार की लेखन प्रक्रिया की आरम्भिक गंध व्याप्त है।
आपका जन्म 30 जुलाई सन् 1970 को मुज्फ्फरनगर (उ0प्र0) में हुआ। आपके पिता का नाम श्री हरिकिशन एवं माता का नाम सोहनवीरी है। प्रमोद कुमार की शिक्षा एम0एस0सी0, बी0एड0 उपाधि स्तर तक सम्पन्न हुई। सम्प्रति, मूर्ति देवी सरस्वती इन्टर कालेज, नजीबाबाद में अध्यापक के रूप में कार्यरत हैं।
हिन्दी साहित्य में प्रमोद कुमार ‘प्रेम‘ ने गीत, गजल के माध्यम से अपनी रचनात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। भारती साहित्य कला संस्कृति संस्थान, नजीबाबाद से आपका सक्रिय संबध है। आपकी रचनाओं स्फुट प्रकाशन, प्रसारण हुआ है। सामाजिक विसंगतियों पर तथा व्यवस्था के तौर-तरीके पर प्रमोद कुमार प्रेम ने अपनी रचनाओं द्वारा करारा कटाक्ष किया है। उदाहरणार्थ, उनकी अग्रांकित पंक्तियाँ
‘ऐ वतन, मेरे प्यारे वतन
परमाणु बम बना
हम कितनी उन्नति कर गये
ये ना हमने सोचा कभी
भूख से बच्चे कितने मर गये
ऊँचाइयों पर संसार की
बस रहे तेरा नाम
ऐ वतन, मेरे प्यारे वतन........।
प्रमोद कुमार प्रेम में साहित्यिक संदर्भ में अनन्त सम्भावनाएँ, करवट बदलती लगती है। लेकिन शब्द विन्यास, भाषा-शैली में, रचनाकार की लेखन प्रक्रिया की आरम्भिक गंध व्याप्त है।

