Thursday, December 1, 2011

बिजनौर अनेक विश्वप्रसिद्ध ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी...


बिजनौर अनेक विश्वप्रसिद्ध ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी है। इसने देश को नाम दिया है, अनेक अंतर्राष्ट्रीय प्रतिभायें दी हैं। यहां की धरती उर्वरक ही उर्वरक है। बिजनौर का उत्तरी, उत्तर पूर्वी और उत्तर पश्चिमी भाग महाभारत काल तक सघन वनों से आच्छादित था। इस वन प्रांत में, अनेक ज्ञात और अज्ञात ऋषि-मुनियों के निवास एवं आश्रम हुआ करते थे। सघन वन और गंगा तट होने के कारण, यहां ऋषि-मुनियों ने घोर तप किये, इसीलिए बिजनौर की धरती देवभूमि और तपोभूमि भी कहलाती है। सघन वन तो यहां तीन दशक पूर्व तक देखने को मिले हैं। लेकिन वन माफियाओं से यह देवभूमि-तपोभूमि भी नहीं बच सकी है।प्रारंभ में इस जनपद का नाम वेन नगर था। राजा वेन के नाम पर इसका नाम वेन नगर पड़ा। बोलचाल की भाषा में आते गए परिवर्तन के कारण कुछ काल के बाद यह नाम विजनगर हुआ, और अब बिजनौर है। वेन नगर के साक्ष्य आज भी बिजनौर से दो किलोमीटर दूर, दक्षिण-पश्चिम में खेतों में और खंडहरों के रूप में मिलते हैं। तत्कालीन वेन नगर की दीवारें, मूर्तियां एवं खिलौने आज भी यहां मिलते हैं। लगता है, यह नगर थोड़ी ही दूर से गुजरती गंगा की बाढ़ में काल कल्वित हो गया।
अगर यह कहा जाए कि बिजनौर को दुनिया जानती है तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगी। देश के किसी राज्य में या देश के बाहर बिजनौर का नाम आने पर आपसे प्रश्न किया जा सकता है कि वही बिजनौर जहां का सुल्ताना डाकू था। प्रश्नकर्ता को यह बताकर उसका अतिरिक्त ज्ञान बढ़ाया जा सकता है कि भारतवर्ष को नाम देने वाला भी बिजनौर का ही था। जी हां! हम भरत के बारे में बोल रहे हैं। सुल्ताना भी बिजनौर का ही था, यहां हम उसका जिक्र भी करेंगे। पहले संक्षेप में भरत के बारे में बता दें। भरत बिजनौर के ही थे शकुंतला और राजा दुष्यंत के पुत्र। जो बचपन में शेर के शावकों को पकड़कर उनके दांत गिनने के लिए विख्यात हुए।
संस्कृत के महान कवि कालीदास के प्रसिद्ध नाटक अभिज्ञान शाकुंतलम की नायिका शकुंतला बिजनौर की धरती पर ही पैदा हुई थीं। जिनका लालन-पोषण कण्व ऋषि ने किया था। हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत एक बार इस वन प्रांत में आखेट करते हुए पहुंचे और मालिन नदी के किनारे कण्वऋषि के आश्रम के बाहर पुष्प वाटिका में सौंदर्य की प्रतीक शकुंतला से उनका प्रथम प्रणय दर्शन हुआ। इससे उनके विश्वप्रसिद्ध पुत्र भरत पैदा हुए, जिनके नाम पर आज भारत का नाम भारत वर्ष है। कहते हैं कि शकुंतला से प्रणय संबंध स्थापित करने के बाद महाराज दुष्यंत अपनी राजधानी हस्तिनापुर तो लौट गए, किंतु किसी टोटके के प्रभाव में अपनी राजधानी हस्तिनापुर में प्रवेष करते ही यह सारा घटनाक्रम भूल गए। शकुंतला से जो संतान पैदा हुई वह दुष्यंत के पुत्र भरत थे।
कण्वऋषि ने भरत की एक बाह में एक ऐसा रक्षा ताबीज़ बांध दिया था जिसकी विशेषता यह थी कि उसे केवल पिता ही छू सकता है। दुष्यंत ने शकुंतला को निशानी के लिए एक अंगूठी दी थी। कहा जाता है कि महाराज दुष्यंत के लिए टोटका था कि वह बिजनौर वन प्रांत के बाहर जाकर अर्थात अपनी राजधानी की सीमा में प्रवेश करते ही शकुंतला को भूल जाएंगे और वही हुआ। यह सारा घटनाक्रम मालिन नदी के तट और उसके आसपास का माना जाता है। मालिन नदी बिजनौर में ही बहती है। कहते हैं कि शकुंतला की अंगूठी मालिन नदी में गिर गई थी जिसे एक मछली ने निगल लिया था, संयोग हुआ कि वह मछली एक मछुवारे के हाथ लगी, जिसे चीरने पर उसके पेट से वह अंगूठी निकली जो दुष्यंत ने शकुंतला को दी थी। जब वह अंगूठी राजा दुष्यंत के पास पहुंचाई गई तब उन्हें अंगूठी देखकर संपूर्ण दृष्टांत और दृश्य सामने आ गए जो वह एक टोटके के कारण भूले हुए थे। इसके बाद उन्होंने शकुंतला को अपनी पत्नी और भरत को पुत्र के रूप में स्वीकार किया। कहते हैं कि मालिन नदी के तट पर महाकवि कालीदास ने अपने प्रसिद्ध नाटक अभिज्ञान शाकुंतलतम् को विस्तार दिया था।
करीब दस किलोमीटर दूर गंगा के तट पर आध्यात्म और वानप्रस्थ का रमणीक स्थान है, जिसे विदुर कुटी के नाम से जाना जाता है। दुनियां के सर्वाधिक बुद्घिमानों में से एक महात्मा विदुर की यह पावन आश्रम स्थली है। महाभारत और उसके पात्रों का बिजनौर जनपद से गहरा संबंध है। इस जनपद में महाभारत काल की अनेक घटनाओं के साक्ष्य पाए जाते हैं। महाभारत के प्रमुख पात्र और सर्वाधिक बुद्धिमान महात्मा विदुर का नाम कौन नहीं जानता। देश विदेश के लोग विदुर कुटी आते हैं और इस आश्रम में वानप्रस्थी के रूप में अपना समय बिताते हैं। कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण भी विदुरजी के आश्रम में आए थे और उन्होंने अपना काफी वक्त उनके साथ बिताया। श्रीकृष्ण ने महात्मा विदुर जी के यहां बथुए का साग खाया था। इसलिए इस संबंध में कहा करते हैं कि दुर्योधन घर मेवा त्यागी, साग विदुर घर खायो। विदुर कुटी पर बारह महीने आज भी बथुवा पैदा होता है।
महाभारत में वीरगति को प्राप्त बहुत सारे सैनिकों की विधवाओं को विदुरजी ने अपने आश्रम के पास बसाया था। वह जगह आज दारानगर के नाम से जानी जाती है। दारा का शाब्दिक अर्थ तो आप जानते ही होंगे-औरत-औरतें। इस संपूर्ण स्थान को लोग दारानगर गंज कहकर पुकारते हैं। यहां पर और भी कई आश्रम हैं जिनका वानप्रस्थियों और तपस्वियों से गहरा संबंध है। कार्तिक पूर्णिमा पर विदुर कुटी को स्पर्श करती हुई गंगा के तट पर मेला भी लगता है। गंगा में स्नान करने के लिए विदुर कुटी पर बड़े-बड़े घाट भी निर्मित हैं। पिछले कुछ वर्षों से गंगा ने विदुर कुटी से काफी दूर बहना शुरू कर दिया है। इसका कारण कुछ मतावलंबी धर्म आध्यात्म में गिरावट से जोड़ते हैं तो इसका दूसरा कारण भौगोलिक अवस्था में उतार-चढ़ाव और गंगा में खनिजों का अनियंत्रित दोहन माना जाता है। गंगा में खनिजों के बेतहाशा दोहन के कारण गंगा अपना परंपरागत मार्ग छोड़ती जा रही है। इसके जल क्षेत्र में घुसपैठ के कारण कृषि और आबादी वाले इलाके हर साल बाढ़ की चपेट में आते हैं। गंगा के विदुर कुटी के तटों वापस नहीं आने से यहां के घाट और उनकी जल आधारित प्राकृतिक छटा अब देखने को नहीं मिलती है।
बिजनौर जनपद में चांदपुर के पास एक गांव है सैंद्वार। महाभारत काल में सैन्यद्वार इसका नाम था। यहां पर भारद्वाज ऋषि के पुत्र द्रोण का आश्रम एवं उनका सैन्य प्रशिक्षण केंद्र हुआ करता था। इस केंद्र के प्रांगण में द्रोण सागर नामक एक पौण्ड भी है। यहां महाभारतकाल के अनेक स्थल एवं नगरों के भूमिगत खण्डहर मौजूद हैं। सन् 1995-96 में चांदपुर के पास राजपुर नामक गांव से गंगेरियन टाइप के नौ चपटे तांबे के कुल्हाड़े और नुकीले शस्त्र पाए गये जिससे स्पष्ट होता है कि यहां ताम्र युग की बस्तियां रही हैं। महाभारत का युद्ध, गंगा के पश्चिम में, कुरुक्षेत्र में हुआ था। हस्तिनापुर, गंगा के पश्चिम तट पर है, और इसके पूर्वी तट पर बिजनौर है। उस समय यह पूरा एक ही क्षेत्र हुआ करता था।
महाभारत काल के राजा मोरध्वज का नगर, मोरध्वज, बिजनौर से करीब 40 किलोमीटर दूर है। गढ़वाल विश्वविद्यालय ने जब खुदाई करायी तो यहां के भवनों में ईटें ईसा से 5 शताब्दी पूर्व की प्राप्त हुईं। यहां पर बहुमूल्य मूर्तियां और धातु का मिलना आज भी जारी है। यहां के खेतों में बड़े-बड़े शिलालेख और किले के अवशेष अभी भी किसानों के हल के फलक से टकराते हैं। आसपास के लोगों ने अपने घरों में अथवा नींव में इसी किले के अवशेषों के पत्थर लगा रखे हैं। गढ़वाल विश्वविद्यालय को खुदाई में जो बहुमूल्य वस्तुएं प्राप्त हुईं वह उसी के पास हैं। यहां पर कुछ माफिया जैसे लोग बहुमूल्य वस्तुओं की तलाश में खुदाई करते रहते हैं और उन्हें धातुएं प्राप्त भी होती हैं। यहां ईसा से दूसरी एवं तीसरी शताब्दी पहले की केसीवधा और बोधिसत्व की मूर्तियां भी मिलीं हैं और ईशा से ही पूर्व, प्रथम एवं दूसरी शताब्दी काल के एक विशाल मंदिर के अवशेष भी मिले हैं। यहां बौद्ध धर्म का एक स्तूप भी कनिंघम को मिल चुका है। कहते हैं कि इस्लामिक साम्राज्यवादियों के निरंतर हमलों की श्रृंखला में यहां भारी तोड़फोड़ हुई।
इन्ही इस्लामिक साम्राज्यवादियों में से एक हमलावर नजीबुद्दौला ने मोरध्वज के विशाल किले को बलपूर्वक तोड़कर अपने बसाये नगर नजीबाबाद के पास, किले की ईटों से अपना एक विशाल किला बनाया। बिजनौर जिला गजेटियर कहता है कि इसमें लगे पत्थर मोरध्वज स्थान से लाकर लगाए गए हैं। मोरध्वज के किले की खुदाई में आज भी मिल रहे बड़े पत्थरों और नजीबुद्दौला के किले में लगे पत्थरों की गुणवत्ता एकरूपता और आकार बिल्कुल एक हैं। पत्थरों को एक दूसरे से जोड़ने के लिए जो हुक इस्तेमाल किए गए थे, वह भी एक समान हैं। इसलिए किसी को भी यह समझने में देर नहीं लगती है कि नजीबुद्दौला ने मोरध्वज के किले को नष्ट करके उसके पत्थरों से अपने नाम पर यह किला बनवाया। सन् 1887 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने इसके अधिकांश भाग को ढहा दिया। इसकी दीवारें बहुत चौड़ी हैं, जो इसके विशाल अस्तित्व की गवाह हैं। नजीबुद्दौला का जो महल था उसमें आज पुलिस थाना नजीबाबाद है। यहां पर नजीबुद्दौला के वंशजों की समाधियां भी हैं। मगर संयोग देखिएगा कि जो किला नजीबुद्दौला ने बनवाया था, आज उसे पूरी दुनिया सुल्ताना डाकू के किले के नाम से जानती है। यदि आप बिजनौर आकर यह जानने की कोशिश करें कि जिले में नजीबुद्दौला का किला कहां है, तो इस प्रश्न का जल्दी से उत्तर नहीं मिल पाएगा और यदि आप ने पूछा कि सुल्ताना डाकू का किला कहां है, तो यह कोई भी बता सकता है कि वह नजीबाबाद के पास है। भला डाकुओं के भी किले होते हैं? मगर आज नजीबुद्दौला का कोई नाम लेने वाला नहीं है।
बिजनौर जनपद में एक ऐतिहासिक कस्बा मंडावर है। इतिहासकार कहते हैं कि पहले इस स्थान का नाम प्रलंभनगर था, जो आगे चलकर मदारवन, मार्देयपुर, मतिपुर, गढ़मांडो, मंदावर और अब मंडावर हो गया। बौद्ध काल में यह एक प्रसिद्ध बौद्ध स्थल था। इतिहासकार कनिंघम का मानना है कि चीनी यात्री ह्वेनसांग यहां पर करीब 6 माह तक रहा और उसने इस पूरे इलाके का ऐतिहासिक और भौगोलिक अध्ययन किया। अपने यात्रावृत में इस स्थान को मोटोपोलो या मोतीपुर नाम भी दिया गया है। मंडावर के पास बगीची के जंगल में माला देवता के स्थान पर आज भी पुरातत्व महत्व की कीमती प्रतिमाएं खेतों में मिलती हैं। सन् 1130 एड़ी में अरब यात्री इब्नेबतूता मंडावर आया था। अपने सफरनामें में उसने दिल्ली से मंडावर होते हुए अमरोहा जाना लिखा है। सन् 1227 में इल्तुतमिश भी मंडावर आया था और यहां उसने एक विशाल मस्जिद बनवायी जो आज किले की मस्जिद के नाम से प्रसिद्ध है। किला तो अब नहीं रहा पर मस्जिद मौजूद है। यह मस्जिद पुरातत्व महत्व का एक नायाब नमूना है। इसमें इमाम साहब के खड़े होने के स्थान एवं छत में कुरान शरीफ की पवित्र आयतें लिखी हैं। एक लंबा समय बीतने पर भी इसकी लिखावट के रंगों की चमक अभी भी मौजूद है।
ब्रिटिशकाल में महारानी विक्टोरिया को मंडावर के ही मुंशी शहामत अली ने उर्दू का ट्यूशन पढ़ाया था। मुंशी शहामत अली अंग्रेज सरकार के रेजीडेंट थे। महारानी विक्टोरिया ने उन्हें उर्दू पढ़ाने के एवज में मंडावर में इनके लिए जो महल बनवाया था। यह महल पूरी तरह से यूरोपीएन शैली में है और इसमें अत्यंत महंगी लकडि़यां दरवाजें खिड़कियां और फानूस हुआ करते थे। अब सब कुछ ध्वस्त होता जा रहा है। यह संपत्ति अब वक्फबोर्ड के अधीन है। किरतपुर के पास बगीची के जंगलों में जहां तहां विशाल कटे हुए पत्थर देखने को मिलते हैं। यहां पर इतिहास के शोध छात्र भ्रमण करते हैं और यहां के पत्थरों का किसी काल या देशकाल से मिलान करते हैं। देखा जाए तो पूरा बिजनौर जनपद ही इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं से भरा पड़ा है। शोध में संसाधनों और इतिहास में दिलचस्पी में अभाव के कारण इस पर ऐसा काम नहीं हो पाया जिस प्रकार यूरोपीय देशों में काम चल रहा है।
आइए, आपका बिजनौर की एक और अद्भुत सच्चाई से सामना कराते हैं। आप माने या न माने लेकिन यह सच है कि बिजनौर से कुछ दूर जहानाबाद में यहां एक ऐसी मस्जिद थी जिस पर कभी गंगा का पानी आने से इलाहाबाद और बनारस में बाढ़ आने का पता चल जाया करता था। मुगल बादशाह शाहजहां ने यहां की बारह कुंडली खाप के सैयद शुजाद अली को बंगाल की फतह पर प्रसन्न होकर यह जागीर दी थी, जिसका नाम पहले गोर्धनपुर था और अब जहानाबाद है। शुजातअली ने गोर्धनपुर का नाम बदलकर ही जहानाबाद रखा। इन्होंने गंगातट पर पक्का घाट बनवाया और एक ऐसी विशाल मस्जिद तामीर कराई कि कि जिस पर अंकित किए गये निशानों तक गंगा का पानी चढ़ जाने से इलाहाबाद और बनारस में बाढ़ आने का पता चलता था। लगभग सन् 1920 में दुर्भाग्य से आई भयंकर बाढ़ से यह मस्जिद ध्वस्त हो गई जबकि उसकी मीनारों के अवशेष अभी भी यहां पड़े दिखाई देते हैं। यहां एक किला भी था, जो अब खत्म हो गया है। कहते हैं इस किले से दिल्ली तक एक सुरंग थी। यहां से कुछ दूर पुरातत्व महत्व का एक नौ लखा बाग है। वह भी एक किले जैसा। इसमें शुजात अली और उनकी बेगम की सफेद संगमरमर की समाधियां हैं। बांदी और इनके हाथी-घोड़ों की भी समाधियां पास में ही हैं। ये समाधियां पुरातत्व विभाग के अधीन हैं, लेकिन देख-रेख के अभाव में इनकी हालत खस्ता होती जा रही है।
मुगलकाल को याद कीजिए। अकबर के नौ रत्नों में से एक अबुल फजल और फैजी चांदपुर के पास बाष्टा कस्बे के पास एक गांव के रहने वाले थे। राज्य की सूचना निदेशालय की एक स्क्रिप्ट के अनुसार बीरबल बिजनौर से ही कुछ दूर कस्बा खारी के रहने वाले थे। हालांकि बीरबल के बारे में इससे ज्यादा कुछ पता नहीं चल सका है। इसी प्रकार गंगा के तट पर बसे कुंदनपुर गांव में एक किला था जो सन् 1979 की बाढ़ में बह गया। कहा जाता है कि यह राजा भीष्मक की राजधानी थी। कहते हैं कि इसी के पास एक मंदिर से श्रीकृष्ण, भीष्मक की पुत्री रूक्मणि को हर कर ले गए थे। यह मंदिर आज भी है। हस्तिनापुर के सामने नागपुर आज भी, नारनौर के नाम से जाना जाता है। यहां सीतामढ़ी नाम का एक विख्यात मंदिर है। इतिहासकार कहते हैं कि पृथ्वी को समतल कर भूमि से अन्न उत्पादन करने की शुरूआत करने वाले रामायण काल के शासक प्रथु के अधीन यह पूरा क्षेत्र था।
बढ़ापुर कस्बे से पांच किलोमीटर पूर्व में जैन धर्म के भगवान पारसनाथ के नाम से एक महत्वपूर्ण स्थान है। जैन धर्मावलंबियों की मान्यता है कि भगवान पारसनाथ यहां कुछ समय रूके थे। यहां पुराने किले के अवशेष हैं और बड़ी-बड़ी ध्वस्त हो चुकीं, जैन प्रतिमाएं और शिलाएं हैं जो जगह-जगह बिखरी पड़ी हैं।
सुल्ताना की नजीबुद्दौला के किले से पहचान की एक सत्य कहानी है। खूंखार, दबंग और अपराधी प्रवृत्ति के लिए बदनाम हुई भातु नामक एक दलित जाति के लोगों के सुधार के नामपर तत्कालीन अंग्रेजी प्रशासन ने इस पत्थरगढ़ के किले को भातुओं के सुधार गृह के रूप में इस्तेमाल किया था। उस समय स्वतंत्रता आंदोलन देश में जोरों पर चल रहा था और सशस्त्र क्रांति में विश्वास करने वाले स्वतंत्रता के आंदोलनकारियों को भातु जाति के, नवयुवकों का बड़ा सहयोग मिल रहा था। अंग्रेजी प्रशासन की नाक में दम कर देने वाले भातुओं पर नजर रखने के लिए अंग्रेजी प्रशासन ने इनको इस पत्थरगढ़ के किले में निरुद्ध कर दिया। इनमें से सुल्तान नामक एक युवक कुछ युवाओं के एक गुट के साथ विद्रोह करके अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र जंग में कूद पड़ा। इसने अपना एक संगठन बनाया और थोड़े ही समय में अंग्रेजी शासक और उनके पिठ्ठू ज़मीदार सुल्ताना के नाम से थर्राने लगे। अंग्रेजों के पिट्ठू कहे जाने वाले जमींदारों की तो मानों शामत ही आ गई। उस समय के अंग्रेज पुलिस कमिश्नर मिस्टर यंग ने सुल्ताना को पकड़ने के लिए देशभर में जाल बिछाया था। बिजनौर में किलेनुमा थाने भी उसी समय खोले गए थे। लेकिन अंग्रेज पुलिस, सुल्ताना को नहीं पकड़ पा रही थी। कहते हैं कि किसी संत ने सुल्ताना को बोला था, कि जब वह प्रसन्न होकर किसी बच्चे को गोद में उठायेगा तो उसकी मृत्यु निकट होगी। इसीलिए सुल्ताना ने अपनी शादी भी नहीं की थी। जनपद के मिट्ठीबेरी गांव में सुल्ताना ने एक महिला के नवजात बच्चे को गोद में उठाया, तभी उसे संत की बात याद आयी और उसी समय अंग्रेज पुलिस के घेरे में आकर, अपने करीब 150 साथियों के साथ पकड़ा गया। सन् 1927 में सुल्ताना को आगरा की सेंट्रल जेल में उसके 15 साथियों के साथ फांसी दे दी गई। अंग्रेज तो उसको डाकू मानते थे, लेकिन कुछ लोगों का यह मत है कि वह डाकू नहीं बल्कि एक क्रांतिकारी था। उसके पकडे़े जाने को लेकर और भी कुछ श्रुतियां हैं जिनमें एक श्रुति यह भी है कि नजीबाबाद के कुछ मुसलमान जमीदारों पर यकीन करके उनकी मुखबरी पर सुल्ताना पकड़ा गया था। बहरहाल सुल्ताना डाकू के नाम पर रंगमंच पर नाटक भी खेला जाता है, जिसे लोग बड़े चाव से देखते हैं।
बिजनौर में कई छोटी बड़ी रियासतें थीं। इनमें साहनपुर, हल्दौर और ताजपुर बड़ी और प्रसिद्घ रियासतें हैं। जमींदारों का भी यह जिला माना जाता है। रियासतदारों के साथ-साथ जमींदार त्यागी राजपूतों का भी यहां काफी प्रभाव रहा है। साहनुपर स्टेट अकबरकाल की स्टेट है। हल्दौर, सहसपुर, स्योहारा, ताजपुर भी प्राचीन स्टेट हैं। ताजपुर के राज परिवार के दो युवक विदेश गये और वहां से शादी करने पर ईसाई हो गए। उन्होंने विदेश से लौटकर ताजपुर में एक शानदार चर्च बनवाया। यह चर्च देश का दूसरे नंबर का भारतीयों का बनवाया हुआ चर्च है। इसके घंटों की आवाज़ काफी दूर तक सुनाई देती है। शेरशाह शूरी ने शेरकोट बसाया था। साहनपुर में मोटा महादेव शिव मंदिर पुरातत्व महत्व की जगह है। जलीलपुर क्षेत्र के गांव धींवरपुरा में कई एकड़ क्षेत्र में फैला प्राचीन बड़ का पेड़ वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय है। नजीबाबाद से कुछ किलोमीटर दूर जोगिरमपुरी में मुस्लिम संप्रदाय के प्रसिद्घ शिया संत सैयद राजू की मजार है, जहां प्रति वर्ष विशाल उर्स होता है। इसमें ईरान और अन्य देशों के शिया धर्मावलंबियों के साथ ही साथ अन्य धर्म और जातियों के श्रद्घालु भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।
बिजनौर जनपद ने देश को कई राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय प्रतिभाएं भी दी हैं, जैसे-प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा आत्माराम बिजनौर के थे।
कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो
निराश मनुष्यों को आशावादी बनाने वाली इन पंक्तियों के रचनाकार एवं गज़लकार कवि दुष्यंत बिजनौर के थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान साहित्य एवं पत्रकारिता की मशाल लेकर चलने वाले संपादकाचार्य पं रुद्रदत्त शर्मा, पंडित पदमसिंह शर्मा, फतेहचंद शर्मा, आराधक, राम अवतार त्यागी, मशहूर उर्दू लेखिका कुर्तुल एन हैदर, पत्रकार स्वर्गीय राजेंद्रपाल सिंह कश्यप, प्रसिद्घ संपादक चिंतक बाबू सिंह चौहान, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय शिवचरण सिंह त्यागी बिजनौर के ही थे। उर्दू के प्रख्यात विद्वान मौलवी नजीर अहमद रेहड़ के रहने वाले थे। इन्होंने उर्दू साहित्य पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं। इंडियन पैनलकोड का इन्होंने इंगलिश से उर्दू में अनुवाद भी किया है। सरकार ने उन्हें उनके उर्दू साहित्य की सेवाओं के लिए शमशुल उलेमा की उपाधि दी तथा एडिनवर्ग विश्वविद्यालय ने उन्हें डा ऑफ लॉ की उपाधि दी। वे अंग्रेजों के जमाने के डिप्टी कलेक्टर थे।
देश के प्रसिद्ध समाचार पत्र समूह टाइम्स ऑफ इंडिया के स्वामी एवं जैन समाज के शीर्ष नेता साहू अशोक कुमार जैन, साहू रमेश चंद्र जैन, पत्रकार लेखक डा महावीर अधिकारी, भारतीय हाकी टीम के प्रमुख खिलाड़ी और पूर्व ओलंपियन पद्मश्री जमनलाल शर्मा, भारतीय महिला हाकी टीम की पूर्व कप्तान रजिया जैदी, भूतपूर्व गर्वनर धर्मवीरा, फिल्म निर्माता प्रकाश मेहरा बिजनौर की देन हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के समय का उर्दू का प्रसिद्ध तीन दिवसीय समाचार पत्र मदीना बिजनौर से प्रकाशित होता था। उस समय यह समाचार पत्र सर्वाधिक बिक्री वाला एवं लोकप्रिय था। काकोरीकांड के अमर शहीदों का प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय शिवचरण सिंह त्यागी के गांव पैजनियां से गहरा रिश्ता रहा है। अशफाक उल्ला एवं चंद्रशेखर जैसे अमर शहीदों ने यहां अज्ञात वास किया था। स्वर्गीय त्यागी एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने कभी सरकार से न पेंशन ली और न ही कोई अन्य लाभ। पैजनियां गांव को स्वतंत्रता आंदोलनकारियों का तीर्थ भी कहा जाता है। नूरपुर थाने पर 16 अगस्त को स्वतंत्रता आंदोलन का झंडा फहराने वाले दो युवकों को अंग्रेजों ने गोली से उड़ा दिया था। तभी से हर वर्ष उनकी याद में नूरपुर में विशाल शहीद मेला लगता है।
राजनैतिक रूप से भी बिजनौर जनपद देश के मानचित्र पर चमकता रहा है। भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री हाफिज मोहम्मद इब्राहिम, बाबू गोविंद सहाय और चौधरी गिरधारी लाल ने काफी समय तक बिजनौर का प्रभावशाली राजनीतिक नेतृत्व किया है। बिजनौर के विकास में इन राजनेताओं का अभूतपूर्व योगदान रहा है। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के राजनीतिक कैरियर की शुरूआत भी बिजनौर लोकसभा सीट से चुनाव लड़कर हुई। बसपा ने सबसे पहले विधान सभा की बारह विधानसभा सीटों में से 4 सीटें अकेले बिजनौर से जीती थीं। बिजनौर खेती की पैदावार में भी सबसे आगे है। यहां गेहूं गन्ना-धान देसी उड़द प्रमुख उपज है। क्रेशर उद्योग का यहां काफी विस्तार हुआ है, लेकिन अब इसमें मुनाफा नहीं होने से उद्यमियों ने इससे हाथ खींच लिये हैं। फिर भी बिजनौर शुगर उत्पादन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आ रहा है।
-भोलानाथ त्‍यागी
संपर्क: ‘विनायकम’, इमलिया कैंपस, सिविल लाइन, बिजनौर (उत्‍तर प्रदेश)
ईमेल:bholanathtyagi@gmail.com
फोन: 09456873005


Bhola Nath Tyagi
Bhola Nath Tyagi
Bhola Nath Tyagihttp://yourlisten.com/channel/content/98817/Roopak_Itihaas_Bolta_hai_Bhola_Nath_Tyagi?rn=kebrrrs220ao
Listen Audio | Upload Audio | Roopak - Itihaas Bolta hai - Bhola Nath Tyagi | YourListen.com
YourListen.com Audio Blogs: Roopak- Written by - Bhola Nath Tyagi... YourListen...
Listen Audio | Upload Audio | Roopak - Itihaas Bolta hai - Bhola Nath Tyagi | YourListen.com
YourListen.com Audio Blogs: Roopak- Written by - Bhola Nath Tyagi... YourListen.com an audio website where users can upload, listen, share,


Wednesday, August 10, 2011

.भारतीय स्वाधीनता संग्राम में काकोरी कांड

  • .भारतीय स्वाधीनता संग्राम में काकोरी कांड एक ऐसी घटना है जिसने अंग्रेजों की नींव झकझोर कर रख दी थी। अंग्रेजों ने आजादी के दीवानों द्वारा अंजाम दी गई इस घटना को काकोरी डकैती का नाम दिया और इसके लिए कई स्वतंत्रता सेनानियों को 19 दिसंबर 1927 को फांसी के फंदे पर लटका दिया।
  • फांसी की सजा से आजादी के दीवाने जरा भी विचलित नहीं हुए और वे हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए। बात 9 अगस्त 1925 की है जब चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह सहित 10 क्रांतिकारियों ने मिलकर लखनऊ से 14 मील दूर काकोरी और आलमनगर के बीच ट्रेन में ले जाए जा रहे सरकारी खजाने को लूट लिया।
  • दरअसल क्रांतिकारियों ने जो खजाना लूटा उसे जालिम अंग्रेजों ने हिंदुस्तान के लोगों से ही छीना था। लूटे गए धन का इस्तेमाल क्रांतिकारी हथियार खरीदने और आजादी के आंदोलन को जारी रखने में करना चाहते थे।
  • इतिहास में यह घटना काकोरी कांड के नाम से जानी गई, जिससे गोरी हुकूमत बुरी तरह तिलमिला उठी। उसने अपना दमन चक्र और भी तेज कर दिया।
  • अपनों की ही गद्दारी के चलते काकोरी की घटना में शामिल सभी क्रांतिकारी पकडे़ गए, सिर्फ चंद्रशेखर आजाद अंग्रेजों के हाथ नहीं आए। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के 45 सदस्यों पर मुकदमा चलाया गया जिनमें से राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई।
  • ब्रिटिश हुकूमत ने पक्षपातपूर्ण ढंग से मुकदमा चलाया जिसकी बड़े पैमाने पर निंदा हुई क्योंकि डकैती जैसे मामले में फांसी की सजा सुनाना अपने आप में एक अनोखी घटना थी। फांसी की सजा के लिए 19 दिसंबर 1927 की तारीख मुकर्रर की गई लेकिन राजेंद्र लाहिड़ी को इससे दो दिन पहले 17 दिसंबर को ही गोंडा जेल में फांसी पर लटका दिया गया। राम प्रसाद बिस्मिल को 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल और अशफाक उल्ला खान को इसी दिन फैजाबाद जेल में फांसी की सजा दी गई।
  • फांसी पर चढ़ते समय इन क्रांतिकारियों के चेहरे पर डर की कोई लकीर तक मौजूद नहीं थी और वे हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर चढ़ गए।
  • काकोरी की घटना को अंजाम देने वाले आजादी के सभी दीवाने उच्च शिक्षित थे। राम प्रसाद बिस्मिल प्रसिद्ध कवि होने के साथ ही भाषायी ज्ञान में भी निपुण थे। उन्हें अंग्रेजी, हिंदुस्तानी, उर्दू और बांग्ला भाषा का अच्छा ज्ञान था।
  • अशफाक उल्ला खान इंजीनियर थे। काकोरी की घटना को क्रांतिकारियों ने काफी चतुराई से अंजाम दिया था। इसके लिए उन्होंने अपने नाम तक बदल लिए। राम प्रसाद बिस्मिल ने अपने चार अलग-अलग नाम रखे और अशफाक उल्ला ने अपना नाम कुमार जी रख लिया।
  • खजाने को लूटते समय क्रान्तिकारियों को ट्रेन में एक जान पहचान वाला रेलवे का भारतीय कर्मचारी मिल गया। क्रांतिकारी यदि चाहते तो सबूत मिटाने के लिए उसे मार सकते थे लेकिन उन्होंने किसी की हत्या करना उचित नहीं समझा।
  • उस रेलवे कर्मचारी ने भी वायदा किया था कि वह किसी को कुछ नहीं बताएगा लेकिन बाद में इनाम के लालच में उसने ही पुलिस को सब कुछ बता दिया। इस तरह अपने ही देश के एक गद्दार की वजह से काकोरी की घटना में शामिल सभी जांबाज स्वतंत्रता सेनानी पकड़े गए लेकिन चंद्रशेखर आजाद जीते जी कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आए।
  • सभी जांबाज क्रांतिकारियों को शत शत नमन |
  • भोलानाथ त्यागी,
  • Bhola Nath Tyagi

    Bhola Nath Tyagihttp://yourlisten.com/channel/content/98817/Roopak_Itihaas_Bolta_hai_Bhola_Nath_Tyagi?rn=kebrrrs220ao
    Listen Audio | Upload Audio | Roopak - Itihaas Bolta hai - Bhola Nath Tyagi | YourListen.com
    YourListen.com Audio Blogs: Roopak- Written by - Bhola Nath Tyagi... YourListen...
    Listen Audio | Upload Audio | Roopak - Itihaas Bolta hai - Bhola Nath Tyagi | YourListen.com
    YourListen.com Audio Blogs: Roopak- Written by - Bhola Nath Tyagi... YourListen.com an audio website where users can upload, listen, share,


Sunday, July 31, 2011

लघु कथा

चूहे
रेलवे गोदाम के सामने पसरी पटरियों पर गेहूं के बोरों से लदे वैगन खडे़ थे। उनके ऊपर से ढका गया तिरपाल अलग हट चुका था। सुरक्षा व्यवस्था का कड ा प्रबन्ध था। राइफल थामे, सुरक्षाकर्मी, सामने खड े रेलवे अधिकारी से बतियाते लगा-

''.......अब क्या करें.... ससुरी महगाई ने कमाल ही कर दिया... घर का खर्च चलना मुच्च्िकल है... मामूली वेतन और घर भर का खर्च... खाना पहनना... बच्चों की पढ ाई... डाक्टर.............।''

''............ हां भाई... कहते तो ठीक हो, कमबखत... सरकार भी रोज मंहगाई बढ ा देती है... हद हो गयी अनाज भी कितना मंहगा है...जीना हराम है सबका...।'' रेलवे अधिकारी ने समर्थन किया था। सामने एक वेैंगन से गेहूं के बोरे उतारकर प्लेटफार्म पर बेदर्दी से रखे जा रहे थें। इस प्रक्रिया में ढेर सा गेहूं नीचे पटरियों पर बिखर रहा था। जिसे देख सुरक्षाकर्मी भावुक हो उठा-''......... कितना नुकसान होता है.. अनाज का चूहे खा जाते है......... बारिश में भीग जाता है........ बिखर जाता है...... यदि हम सब ध्यान दें तो..इससे मंहगाई पर असर पड ेगा...। ''रेलवे अधिकारी ने सिर हिलाया-.........''कहते तो ठीक हो।''

रात्रि में पांच-पांच बोरे गेहूं उस सुरक्षाकर्मी और अधिकारी के घर पहुंच चुका था। देच्च में चूहों की संखया के आंकड े सहज ही बढ गयें थे। - भोलानाथ त्यागी

लघु कथा

बरगद की छाया

बूढ़ा बरगद जर्जर हो चुका था, हवा का तेज झोंका,उसे कोई न कोई आघात दे ही जाता। फिर भी, उसका अस्तित्व, तपती दोपहरी में, चन्दन-सी द्राीतलता का आभास कराने हेतु पूर्ण समर्थ था। उसके नीचे, अब पथिक सुस्ता लेते। पक्षियों का कलरव, उस उपेक्षित एकान्त की नीरवता को, सहज ही भगं करता रहता।

एक दिन अचानक, समय के झोंको ने, आंधी का रूप धारण कर लिया-उसनें बरगद का जर्जर अस्तित्व चरमराने लगा, और देखते ही देखते, वह धराच्चायी हो गया। उस दिन, पक्षियों का कलरव द्राांत था, पथिक बेबस आगें बढ जाते। बरगद के घराच्चायी होने का, कम्पन संवेदनशील धरती में, दूर तक महसूस हुआ था।

उस स्थान पर, बरगद की छाया की कल्पना ही, एक अव्यक्त द्राीतलता दे जाती, पथिक, अब भी वहां सहज ही ठिठक जाते, तथा पल भर को पक्षी, अनायास वहां चहचहाने लगते। बरगद की छाया, एक अतीत बन चुकी थी, लेकिन उस स्थान की पहचान, अभी भी बरगद से जुड ी थी। बरगद-हां, कतिपय मानवीय व्यक्तित्व भी बरगद की छाया का ही पर्याय होते हैं-जो साक्षात्‌ न रहकर भी, अपना अस्तित्व बनाये रखते हैं।

- भोलानाथ त्यागी

लघु कथा

पीवड़ा
रेत की छाती पर पड ी लकीर,ें हवा से बन बिगड रही थीं। राजमार्ग के किनारे, इसी राजस्थानी परिवेच्च में, ढाबे पर अनेकों ट्रक एक कतार में खड े थे। ड्राइवर/क्लीनर अपने विच्चिद्गट अंदाज में बैठे बतिया रहे थे। एक स्थानीय समाचार पत्र का पृद्गठ रेतीली हवा के झोकों से रह.रह कर, सामने टेबिल पर पड ा फडफड ा रहा था। समाचार का द्राीर्पक .'पीवड ा ने तीन व्यक्तियों को मौत की नींद सुलाया' पढ कर एक पाठक ने कहा.'........सा...े...ला...पीवड ा भी कैसा दुच्च्मन है........सोते आदमी की छाती पर रात को चुपचाप बैठ जाता है....... सांस के द्वारा सारा जहर आदमी के अन्दर पहुंचा देता है...........सांप है या मौत का फरिच्च्ता...?।'
यह सुन कर एक अन्य व्यक्ति सहज ही चहक उठा-'क्यों साहब-पीवड ा तो आखिर सांप है...... और सोते आदमी की छाती पर बैठता है.......जबकि हमारे समाज में तो आजकल अनेकों पीवड ा जागते आदमी की छाती पर बैठे हैं......आरक्षण का पीवड ा.......साम्प्रदायिकता का पीवड ा.........भ्रद्गट्राचार का पीवड ा........ये सब अपना जहर घोल रहे हैं..........और आप रेगिस्तान के मामूली से सांप, पीवड ा की पीड ा से त्रस्त हैं'।
इस कथन से पीवड ा का भय, और भी अधिक व्याप्त हो गया था।
- भोलानाथ त्यागी

Saturday, July 30, 2011

कविता

माँ
माँ- आज भी टहलती है,
रात भर/आंगन में-
चादंनी बन,
रसोई में रची-बसी है माँ-
बघार की गंध के साथ,
जब कभी हो जाता है, जुखाम/तो-
तुलसी की पत्ती और काली मिर्च वाली-
चाय में/माँ का- ममतामय चेहरा-
थिरकने लगता है,
जब कभी भी मैनें डाटां/नन्हे बेटे विनायक
को-
माँ ने- मुझे डाटा था-
क्योंकि माँ/ जब दादी बन जाती है-
तो ममता- अनायास बढ़ जाती है उसकी-
लगता है हर माँ-
देखती है, अपने बेटे को/ जीवन भर-
चदंन की गंध बन-
अगरबत्ती के धुऐं की तरह,
व्याप्त होती है- माँ-
हर दिच्चा मे/हर समय-
मां-सार्वमौम सत्य है,
प्रकृति का/जीवन धड कन का-
बघार की सौंधी महक-
और चदंन गंध सा,
कोमल अहसास है-
माँ।
बोनसाई संस्कृति
हमारा देच्च/संस्कृति-
अपनी अलग पहचान रखते थे,
सनातन काल से-
विच्च्वगुरु की गरिमा से विभूद्गिात-
आज अलंकृत है-
राजनीति के, गुरु घंटालो से,
सिद्वान्त और नैतिकता के
कंकालो से,
संस्कृति का बोनसाईकरण-
बलात, कर दिया गया है,
गमलों में उग रहे हैं-
वटवृक्ष,
सूत के कच्चे धागे-औ-
पीपल को छांव
चौपाल/हुक्का औ-गांव
इनका सैट, करोड ों रुपयेेेेेेेे खर्चकर
लगाया जाता है।
तब थिरकती है, नगंई-
बस, फिल्म हिट हो जाती है,
राद्गट्रभक्ति, 'गदर' का पर्याय बन-
चिघांड रही है/और सत्ता-
गगन विहार कर/चिरौरी में लगी है-
मवालियों की, लेकिन
बोनसाई वटवृक्ष, फिर भी
मुस्करा रहा है, क्योंकि-
कुछ भी सही/ है तो वटवृक्ष ही-
भले ही, बोनसाई हो.......।,
- भोलानाथ त्यागी

Wednesday, July 27, 2011

लघु कथा

समीकरण

विच्च्वविधालय की परीक्षाएं सम्पन होने के पच्च्चात, परीक्षा- परिणाम के विद्गाय में छात्र/छात्राओं मे स्वाभाविक जिज्ञासा बनी थी। राजीव ने अपनी चिन्ता को अभिव्यक्ति प्रदान करते हुए कहा था...... 'क्या बताएं इस बार तो काफी कठिन स्वाल आये थे, पास हो जायें, बस इतना ही बहुत है-।

..... क्यों चिंता करते हो यार, अपुन के नम्बर तो चकाचक आयेंगे- इस बार भी परीक्षा की कापियां कहां-कहां जंचने गई हैं... सारी जानकारी कर ली है- अटैची टूर करना है- और बस चाहो तो तुम भी साथ चलना-।

घनच्च्याम ने राजीव को आच्च्वस्त किया था।

इस आच्च्वस्ति के साथ ही च्चिक्षा की सार्थकता उजागर हो उठी थी। परीक्षा परिणाम का यह समीकरण अपने औचित्य पर, स्वयं एक प्रच्च्न-चिन्ह बन गया लगता था।

''पिकनिक''
पतित पावनी गंगा अपनी अविराम गति से बह रही थी। पिकनिक मनाने आई पार्टी जल-क्रीडा मे मग्न थे। सुरा प्रेमियों ने अपनी बोतलें ठडें पानी में, पत्थरों से टिकाकर सहेज दी। सामने थोड़ी दूरी पर एक युवती अपने बच्चे के साथ गंगा स्नान में व्यस्त थी। अनायास अबोध बच्चे का हाथ नहाते समय छूट गया-वह डूबने लगा और माँ की पुकार से पिकनिक पार्टी का ध्यान भंग हो गया।

बच्चा बचा लिया गया। माँ ने अपने गीले आंचल में उसे छिपा लिया, वह हाथ जोड कर जीवनदाता का धन्यवाद ज्ञापित कर रही थी। पिकनिक पार्टी का ध्यान युवती के मदमाते यौवन पर जा टिका, बोतल में बंद सुरा, प्रेमियों के पेट में कभी की उतर चुकी थी। टेपरिकार्डर पर पॉप संगीत बज रहा था, तभी एक सुझाव उभरा- ''........... अमा यार........... सामने देख........... क्या गजब चीज हैं.... पिकनिक रंगीन हो जाएगी... बस जरा सी....हिम्मत की बात है....।''

और, युवती, क्रूर बलात्कार का च्चिकार बन गई। बच्चा, रेत पर पड ा, बरबस रोता रहा। जीवनदाता, सहित, संपूर्ण मित्र मंडली अपना धन्यवाद, ग्रहण कर चुकी थी। पतित पावनी, मूक बनी पूर्ववत बहती रही।

-भोलानाथ त्यागी

Tuesday, July 26, 2011

कविता

रावण का साकेत
पुरवाई, बादल और वद्गर्ाा/की कल्पना
मरूस्थल की तपन में,
लगती है सुखद-
कुछ ऐसे ही,ज्यों-
आजकल,रामराज्य की बात,
की जा रही हो, लेकिन आज-
साकेत तक रावणराज्य पसर गया है,
और बेचारा राम,
राजनीति की बिसात का,
एक मामूली प्यादा भर रह गया है,
जिस के भरोसे-
द्राह औ मात हेतु, चालें चली जाती हैं,
और बेचारी जनता/पूर्ववत-
छली जाती है,
राजराज्य का राजपथ-
लोकतन्त्र
की पगडन्डी में/कहीं-
गहरे-गुम हो गया है,
और बेचारा राम-
रामू बन, एके सैतांलिस थामे-
संसद के मुखय द्वार पर,
पहरा दे रहा है/और अंदर बैठे ढेरों रावण-
लोकतन्त्र से बलात्कार सम्पन्न-
होने की खुच्ची में,
मेजें थपथपा रहें हैं।

कविता


कैक्टस
राजनीति के जगंल में
उग रहें है-
मधु कोड़ा/
नरेन्द्र मोदी की मुस्कान लिये,
मायावी द्राान की मूर्तियों से सजे-
जुरासिक पार्क में विचरते,
डायनासोर रूपी भारी/भरकम-
नेतृत्व,
अपनी उगंली में पड ी, हीरे की अगूंठी-
सहला रहें हैं,
और देच्च का भविद्गय
अध्यापक/टाट- पट्टी विहीन-
विधालयों में,
मिड-डे-मील, भकोस रहा है
उसमें गिजबिजाते कीड े
अब सारी व्यवस्था में फैल गये हैं,
कैक्टस-
फूलों से भर गया है,
कैक्टस के फूूलों का यह-
समीकरण/च्चायद-
कैक्टस ही समझा पाये।

Monday, July 25, 2011

कविता

प्रच्च्न

पानी/आज स्वंय-
पानी-पानी हो रहा हैं,
आंख का पानी/चढ़ गया हैं भेंट-
उपभोक्ता-संस्कृति की
बलि वेदी पर,
आंख का पानी सूख गया हैं
संवेदन द्राून्य है/वर्तमान सोच-
समन्दर खुद प्यासा है
चातक बनी है आच्चा,
आज भी/चारों और-
पसरा है एक रेगिस्तान,
दिगम्बर देह का सच-
थिरक रहा है/कला और सहित्य-
के नाम पर,
अब लगता है-
दो चुल्लू भी नहीं बचा है,
पानी/जो द्राायद काम आता-
कहावत के/सार्थक होने मे,
पानी-स्वंय बन गया है-यक्ष,
और कर रहा है प्रच्च्न-
आपने कभी/कहीं-
पानी देखा है ?

बेचारा मुर्गा

भिनसारे जब-
बसंवारी के उस पार-,
जगंली मुर्गा बांग देता है-
सुरमई आसमान की गोद में
तब/सूरज अंगडाई लेने लगता है,
बज उठती हैं-मन्दिर में घन्टियां,
और मस्जिद से सुनाई देने लगता है-
अजान का स्वर,
गुरुद्वारे में सबद-कीर्तन होने लगता है
और जाग जाता है-
चर्च भी,
लेकिन आज तक-
किसी ने भी,
उस मुर्गे का मजहब नहीं पूछा है,
बांग की भाद्गाा क्या है ?
नही जाना है,
बसंवारी से गुजरती तेज हवा-
बन जाती है, संगीत-
और मुर्गा नाचने ने लगता हैं,
द्रााम होने तक/जब-
अंधियारे की चादर ओढ -
सूरज-चला जाता है सोने,
तो, उसे जगाने के लिये-
जगंली मुर्गा
रात भर बैचेन रहता है,
बेचारा मुर्गा।
- भोलानाथ त्यागी

कविता


अपेक्षा
तुम मझे खून दो-
मैं तुम्हें आजादी दूंगा,
का उद्‌घोद्गा/आज
बदल गया है,।
लोकतन्त्र में खुलेआम-
धिक्कार एंव थू-थू हो रही है,
बेंचारा मतदाता/अपनी नियति देख
सिहर रहा है,
तुम हमें वोट दो-
हम तुम्हारा खून पियेगें,
की भावना लिये,
वोटों के खूंखवार च्चिकारी
व्यस्त हैं, घात लगाने में
और 'सत्यम्‌' के 'असत्य'-
सामने हैं,
तथाकथित बुद्धिजीवि का चिंतन,
भूखा बिलबिला रहा है,
बेसिक च्चिक्षा पोलियो ग्रस्त है
एंव उच्च च्चिक्षा-
लाला की तिजोरियों में
द्राीद्गर्ाासन कर रही है
च्चिक्षण सस्ंथान/
व्यवसायिक परिसर में-
बदल चुके हैं-
मंचो से मधरु स्वर में
गुनगुनाये जाते द्राब्द,
कविता मान लिये जाते हैं
जबकि 'कविता'
गांव के जीर्ण-च्चीर्ण विधालय में
मिड-डे-मील/अपनी थाली में संजोये
दलिये और खिचड़ी में तिरते
कीड े बीन रही है,
और यह कीड े/सारी व्यवस्था में
गिजबिजा रहें है
सठियाये लोकतन्त्र की यह-
उपलब्धि-,
गर्व का विद्गाय है/अथवा द्रार्म का
इसमें उलझी
नेताजी सुभा की भावना
का चीत्कार, बहरे हो चुके कानों तक
यदि सुनाई दे सका-
तो आज का दिन सार्थक होगा,
अन्यथा/'कविता' तो
पूर्वक्त भूखी ही सो जायेगी
अपनी निराच्चा के साथ
- भोलानाथ त्यागी

लघु कथा

गुण्डागर्दी
'क्यो बे,...... क्या नाम है तेरा ? 'दरोगा जी ने अपनी भयंकर मूछे मरोड़ते हुए पूछा था।

उत्तर मिला-'हजूर,..... गयादीन कहते हैं !

'गयादीन की तलाच्ची में, दरोगा जी ने बीस रूपय,े बरामद किये और फिर सवाल दागा -........ 'हरामखोर, बता, ये रुपये कहां से आये, गुण्डागर्दी की कमाई खाता है.......।'

सवाल के साथ ही, बूट की एक जोरदार ठोकर-गयादीन के पेट पर लगी थी, उसने रिरियाते हुए कहा-.........'हजूर, सच जानिये,....... दो दिन की मजदूरी के रुपये लाया था, गुण्डागर्दी नही करता....।'

दरोगा जी ने बीस रुपये अपनी जेब के हवाले कर, गयादीन को उपदेच्चा-'..........चल भाग, आगे से गुण्डागर्दी मत करना,..... साला........... बदमाच्च...।'