Tuesday, July 26, 2011

कविता

रावण का साकेत
पुरवाई, बादल और वद्गर्ाा/की कल्पना
मरूस्थल की तपन में,
लगती है सुखद-
कुछ ऐसे ही,ज्यों-
आजकल,रामराज्य की बात,
की जा रही हो, लेकिन आज-
साकेत तक रावणराज्य पसर गया है,
और बेचारा राम,
राजनीति की बिसात का,
एक मामूली प्यादा भर रह गया है,
जिस के भरोसे-
द्राह औ मात हेतु, चालें चली जाती हैं,
और बेचारी जनता/पूर्ववत-
छली जाती है,
राजराज्य का राजपथ-
लोकतन्त्र
की पगडन्डी में/कहीं-
गहरे-गुम हो गया है,
और बेचारा राम-
रामू बन, एके सैतांलिस थामे-
संसद के मुखय द्वार पर,
पहरा दे रहा है/और अंदर बैठे ढेरों रावण-
लोकतन्त्र से बलात्कार सम्पन्न-
होने की खुच्ची में,
मेजें थपथपा रहें हैं।

No comments:

Post a Comment