प्रच्च्न
पानी/आज स्वंय-
पानी-पानी हो रहा हैं,
आंख का पानी/चढ़ गया हैं भेंट-
उपभोक्ता-संस्कृति की
बलि वेदी पर,
आंख का पानी सूख गया हैं
संवेदन द्राून्य है/वर्तमान सोच-
समन्दर खुद प्यासा है
चातक बनी है आच्चा,
आज भी/चारों और-
पसरा है एक रेगिस्तान,
दिगम्बर देह का सच-
थिरक रहा है/कला और सहित्य-
के नाम पर,
अब लगता है-
दो चुल्लू भी नहीं बचा है,
पानी/जो द्राायद काम आता-
कहावत के/सार्थक होने मे,
पानी-स्वंय बन गया है-यक्ष,
और कर रहा है प्रच्च्न-
आपने कभी/कहीं-
पानी देखा है ?
बेचारा मुर्गा
भिनसारे जब-
बसंवारी के उस पार-,
जगंली मुर्गा बांग देता है-
सुरमई आसमान की गोद में
तब/सूरज अंगडाई लेने लगता है,
बज उठती हैं-मन्दिर में घन्टियां,
और मस्जिद से सुनाई देने लगता है-
अजान का स्वर,
गुरुद्वारे में सबद-कीर्तन होने लगता है
और जाग जाता है-
चर्च भी,
लेकिन आज तक-
किसी ने भी,
उस मुर्गे का मजहब नहीं पूछा है,
बांग की भाद्गाा क्या है ?
नही जाना है,
बसंवारी से गुजरती तेज हवा-
बन जाती है, संगीत-
और मुर्गा नाचने ने लगता हैं,
द्रााम होने तक/जब-
अंधियारे की चादर ओढ -
सूरज-चला जाता है सोने,
तो, उसे जगाने के लिये-
जगंली मुर्गा
रात भर बैचेन रहता है,
बेचारा मुर्गा।
- भोलानाथ त्यागी
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