शोध कार्य --
बीसवीं शती के हिंदी साहित्य संवर्धन में जनपद बिजनौर का योगदान --
डॉ उषा त्यागी-----
‘बिजनौर जनपदीय रचनाकार
और उनका सर्वेक्षणात्मक परिचय...
विनीत प्रकाश गर्ग ‘हुड़दंग नगीनवी‘
साहित्य जगत में ‘ हुड़दंग नगीनवी, के नाम से चर्चित विनीत प्रकाश गर्ग का जन्म 2 मई सन् 1959 को काशीपुर में हुआ। आपके पिता का नाम जयप्रकाश अग्रवाल एवं माता का नाम उमा अग्रवाल हैं। विनीत कुमार गर्ग ने, एम0ए0 एल0एल0बी0 की उपाधि प्राप्त की हैं।
‘हुड़दंग नगीनवी‘ ने काव्य में हास्य-व्यंग्य के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान स्थापित की हैं। आपकी ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित हो, पाठकों को गुदगुदा चुकी है। राष्ट्रीय स्तर पर आपकी रचनाऐं प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। ‘हुड़दंग का हुड़दंग के हंसगुल्ले‘,‘ हुड़दंग के धमाके‘,‘ छक्के छूट गयें‘,‘ रंग और व्यंग्य हुड़दंग के संग,‘‘ खाट खड़ी करवा लो‘, ‘हास-परिहास‘,‘गुदगुदी‘,‘ हुड़दंग की फुलझड़ियाॅं‘ आदि हास्य-व्यंग्य के संग्रह भरपूर चर्चित हुए हैं। सम्प्रति प्रकाशन-मुद्रण व्यवसाय से जुड़े हैं।
कवि सम्मेलनों में, ‘हुड़दंग नगीनवी‘ की हास्य-व्यंग्य रचनाएॅं श्रोताओं को बरबस ठहाका लगाने को विवश कर देती हैं। आपकी भाषा -शैली अपकी विधा के साथ पूर्ण न्याय करती है। ‘हुड़दंग नगीनवी‘ ने, अपनी लेखनी के माध्यम से ,नगीना को राष्ट्रीय स्तर पर साहित्यिक पहचान दिलाई है। हास्य-व्यंग्य के वह, एक सशक्त हस्ताक्षर हैं।
स्वदेश मण्डावरी
स्वदेश मण्डावरी का जन्म 1 जुलाई सन् 1965 को नगीना (बिजनौर) उ0प्र0 में हुआ। आपने बी0ए0, साहित्यरत्न की उपाधि प्राप्त की। लेखन अभिरूचि स्वदेश जी में विद्यार्थी जीवन में ही जाग्रत में ही जाग्रत हो गई थी, तभी से आपसे लेखनी द्वारा अभिव्यक्ति आरम्भ की। हास्य-व्यंग्य, क्षणिकाएॅं आपकी मुख्य विधा हैं। स्वदेश मण्डावरी की रचनाएॅं प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशित होती रही हैं। फीचर्स एजेन्सियों के माध्यम से रचनाओं का प्रकाशन हुआ है। आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रांे से झलकियों का प्रसारण हुआ हैं। ‘ नवाब साहब की तलवार‘,‘डब्ल्यू0 टी‘,‘पासा पलट गया‘,‘रांग नम्बर‘,‘मायके का चक्क्र‘, नामक झलकियाॅं आकाशवाणी से प्रसारित हों,श्रोताओं को गुदगुदाती रही हैं। हास्य व्यंग्य रचनाओं का कैसिट ‘सुनते रहिये‘ शीर्षक से जारी हुआ। लघु काव्य रचनाएॅं, क्षणिकाएॅं, सीपीकाएॅं आदि पाठकों को विशेष शैली में गुदगुदाती रही हैं। स्वदेश जी ने अपनी लेखनी के माध्यम से हिन्दी साहित्य में, व्यंग्य-हास्य के संदर्भ में अपनी एक विशिष्ट पहचान बना, उल्लेखनीय साहित्य सेवा की है। आपकी भाषा-शैली, व्यंग्य विधा के अनुरूप चुटीली होती है। संक्षेप में आप, बहुत बड़ा कटाक्ष, व्यंग्य सहजता के साथ कर जाते हैं। आपके साथ जया मण्डावरी का नाम भी, हिन्दी साहित्य सेवा हेतु चीन्हा जाता है।
आनन्द कुमार ‘गौरव‘
आनन्द कुमार ‘गौरव‘ का जन्म 12 दिसम्बर सन् 1958 को ग्राम अकबरपुर रेहनी (बिजनौर) में हुआ। आपके पिता का नाम श्री जगराज सिंह एवं माता का नाम श्रीमती शकुन्तला देवी था। स्नातक स्तर तक, शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त संप्रति बै।क अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं। कविता, गीत, ग़ज़ल, कहानी, लघुकथा एवं उपन्यास विधा में आनन्द कुमार गौरव का लेखन, समान रूप से होत है। प्रकाशित होने वाली कृतियों में,‘आॅंसूओं के उस पार‘ (उपन्यास), ‘शून्य के मुखौटे‘ (कविताऐं) तथा ‘अॅंधेरो के पांव‘(ग़ज़ले) प्रमुख हैं। आनन्द कुमार गौरव केा अनेक सामाजिक एवं साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मान, पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। अनेक साहित्यिक संस्थाओं से सक्रिय रूप में सम्बद्ध है। कादम्बिनी, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, माधुरी ,धर्मयुग आदि पत्र-पत्रिकाओं में अनेक रचनाएॅं प्रकाशित हो चुुकी है तथा आकाशवाणी से प्रसारण हुए हैं। गौरव की कविताएॅं भी प्रभावोत्पादक हैं-
सोचता हूॅं जिंदगी तुझको नया उपहार क्या दूं टूटते संदर्भ को जुड़ने का अब आधार क्या दूं आस्थाएॅं खो गई हैं, अनुभवों की जटिलता में फूल भी कांटे हुए हैं, नीतियों की विफलता में मैं तिरस्कृत धारणा को अब नया व्यवहार क्या दूं।
× × × पतले है पल-पल ,पग-पग पर अलगाव टूट गई नेह की नाव सांसों की स्वर-मृदुता भटक गई है प्रेरकता की क्षमता सिमट गई है आज बहुत पीड़ित हैं सुधि के अनुभव ,
सुरेशचन्द्र शर्ता हरितवाल
सुरेश्चन्द्र शर्मा का जन्म 1 अक्टूबर सन् 1952 को ग्राम सीकरी बुजुर्ग, वाया नहटौर (बिजनौर) में हुआ। आपके पिता का नाम स्व0 दिलावर दत्त शर्मा एवं माता का नाम विमला शर्मा है। सुरेशचन्द्र शर्मा ने अपनी लगन, मेहनत से विषम परिस्थितियों में एम0 ए0, बी0 एड0 की उपाधि प्राप्त की। सम्प्रति , राजकीय इन्टर कालेज बिजनौर (उ0प्र0) में, अर्थशास्त्र विषय के प्रवक्ता हैं। सुरेशचन्द्र शर्मा का लेखन वर्ष 1974-75 से आरम्भ हुआ। आत्मसन्तुष्टी, परदुखकातरता लिखने को विवश करती है। लेखन की प्रिय विधाओं में गीत, ग़ज़ल एवं कविताएॅं हैं। शर्मा जी के शब्दों में-‘जब मन का लावा फूटता है, तो शब्दों को आकार मिलता जाता हैं........मेरे लिये भूख-प्यास, आशा-निराशा और विश्वास व प्यार का सन्देश देती है कविता। प्रेम, सत्य, आत्मा व परमात्मा का एकाकार कराती है-कविता........।‘ सुरेशचन्द्र शर्मा की कविता का एक उदाहरण दृष्टव्य है- ये बस्ती हिन्दुओं की है, ये मुसलमानेों की कोई बस्ती नहीं है, मगर इन्सानों की। विसंगातियों, विडम्बनाओं पर अपना आक्रोश अभिव्यक्त करते हुए, कवि की लेखनी संयत रहती हैं। भाषा परिपक्व है। रचनाओं में आम आदमी का दर्द, प्रस्फुटित हुआ है।
भोलानाथ त्यागी
भोलानाथ त्यागी का जन्म 4 नवम्बर सन् 1953 को ग्राम सीकरी बुर्जुग, वाया नहटौर, जनपद बिजनौर (उ0प्र0) में हुआ। आपके पिताश्री का नाम स्व0 रामेश्वर प्रसाद त्यागी, एवं माता का नाम स्व0 देवकी त्यागी था। आपके पिता, उत्तर-प्रदेश शासन में कृषि विभाग के, वरिष्ठ अधिकारी थे- लेकिन सात वर्ष की अल्पायु में, भोलानाथ त्यागी , पिता के साये से वंचित हो गये। आपका , पालन- पोषण, शिक्षा-दीक्षा अपने ननिहाल-ग्राम पैंजनियाॅं (बिजनौर) में, सम्पन्न हुई। आपके नाना श्री शिवचरण ंिसंह (1896-1985), विख्यात स्वाधीनता सैनानी, समाज सेवी, साहित्य प्रेमी थे। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में, उनकी क्रांतिकारी भूमिका, राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रही। विख्यात पत्रकार, राष्ट्रभक्त स्व0 गणेश शंकर विद्यार्थी से शिवचरण सिंह की गहन आत्मीयता थी। विद्यार्थी जी के माध्यम से , काकोरी काण्ड के क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह एवं अश्फाकउल्लाह खाॅं ने ग्राम पैंजनियाॅं में शिवचरण सिंह के संरक्षण में अज्ञातवास किया था। बम्बई में अंग्रेज गर्वनर पर बम फैंकने वाले, कं्रातिकारी अप्पाराव भी महाराज बड़ौदा के निर्देश पर पैंजनियाॅं ग्राम में अज्ञातवास में रहे। मिदनापुर (पश्चिम बंगाल) के क्रान्तिकारी वकील अवनीकांत मुकर्जी, पंजाब के क्रान्तिकारी वकील रामसिंह तथा चुन्नी लाल आदि ने भी अज्ञातवास किया। शिवचरण सिंह ने क्रान्तिकारी को हथियार सप्लाई करने हेतु तिब्बत, अफगानिस्तान, श्रीलंका आदि की गुप्त यात्राऐं की। भोलानाथ त्यागी के नाना श्री शिवचरण सिंह, साबरमती आश्रम में, महात्मा गाॅंधी के सानिध्य में भी रहे। सरदार बल्लभभाई पटेल, मदन महोन मालवीय, रवीन्द्रनाथ टैगोर, अरविन्द घोष, साधु टी0 एल0 वास्वानी , जैसे महापुरूषों से आपका निकट सम्पर्क रहा । हिन्दी साहित्य सेवी स्व0 पं0 पद्म सिंह शर्मा (तुलनात्मक आलोचना के जनक) शिवचरण सिंह जी के परिजन थे। इस कारण मुंशी प्रमचन्द्र, हजारी प्रसाद द्विवेदी, जैनेन्द्र कुमार जैन, बनारसीदास चतुर्वेदी, जैसे विद्वान भी आपके घर आते-जाते रहे। स्वाभाविक ही था कि, ऐसे में अपने नाना श्री के संस्कारों का प्रभाव, भोलानाथ त्यागी के बाल मन पर पड़ा । त्यागी जी की आरम्भिक शिक्षा ग्राम पैंजनियाॅं में,स्नातक उपाधि चान्दपुर (बिजनौर) से प्राप्त की। एल-एल0 बी0 की उपाधि आगरा विश्वविद्यालय से प्राप्त करने के उपरान्त, राजनीति शास्त्र एवं हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि, रूहेलखण्ड विश्वविद्यालय, बरेली से प्राप्त की। हिन्दी साहित्य की अप्रतिम सेवा हेतु आपको विद्यावाचस्पति,पी -एच0 डी0 की मानद उपाधि (सन्1984) से भी अलंकृत किया जा चुका है। सन्1970 में आपने, अपनी अभिव्यक्ति को कलम के माध्यम से दिशा प्रदान की। आपकी पहली रचना, कालेज पत्रिका में प्रकाशित हुई। उसके पश्चात साहित्य सृजन का अनवरत सिलसिला जारी हो गया।
कहानी, कविता, लघुकथा, व्यंग्य, नाटक, रूपक, रिपोर्ताज, वार्ता, समीक्षा, संस्मरण, ग़ज़ल, गीत, समसामयिक लेख, क्षणिका आदि हिन्दी साहित्य की अनेक विधाओं में भोलानाथ त्यागी ने समान रूप से सृजन किया है। राष्ट्रीय स्तर पर आपकी पहचान मुख्यतया-लघुकथा, कहानी , व्यंग्य एवं समीक्षा विधा में की जाती है। देश के प्रतिष्ठित लघुकथा लेखकों में, त्यागी जी का नाम प्रमुखता से लिया जाता हैै। देश की लगभग सभी महत्वपूर्ण हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में, आपकी रचनाएॅं प्रकाशित होती रही हैं। आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से, कहानी, वार्ता, रूपक, काव्यपाठ आदि के शताधिक प्रसारण हो चुके हैं। अनेक कहानियों का पुनप्र्रसारण भी हुआ है। दूरदर्शन दिल्ली एवं लखनऊ केन्द्रों से टेलीकास्ट हुआ हैं। अब तक कुल मिला कर, भोलानाथ त्यागी की लगभग एक सहस्त्र से अधिक रचनाओं का स्फुट प्रकाशन एवं प्रसारण हो चुका है।
भोलानाथ त्यागी के आत्मकथ्यानुसार-‘.........ब चपन से यथार्थ के धरातल पर नंगे पैर चलने का अनुभव। माॅं सरस्वती की अनुकम्पा से लेखनी, अभिव्यक्ति का माध्यम बनी। साहित्य शौक नहीं, अपितु अतिरिक्त संवेदनशीलता के कारण सामाजिक विसंगतियों के प्रति, आक्रोश, प्रतिक्रिया का विस्फोटन है।‘ सम्प्रति, भोलानाथ त्यागी अपने कृषि फार्म की देखभाल में व्यस्त रहते हुए, भारतीय किसान की भूमिका में सन्तुष्ट नजर आते हैं। साथ ही,‘ शब्दों की खेती‘ भी सफलता पूर्वक सम्पन्न कर, हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं की श्रीवृद्धि, संवर्धन कर रहे है। उनकी रचनाओं में, आम आदमी की पीड़ा को अभिव्यक्ति मिली है। समाज में फैली विसंगतियों पर, आपने पैना व्यंग्य किया है। राष्ट्रीय स्तर पर आपके साहित्यिक सम्पर्क, गहन आत्मीयता से बने हैं। भोलानाथ त्यागी की, भाषा-शैली आकर्षक एवं विषयानुकूल होती है। शब्द भण्डार व्यापक है। उदाहरण दृष्टव्य है- चाॅंद अपना अस्तित्व-तलाश रहा है, नियान लाइट की चकाचैंध में, और सूरज -चमगादड़ों के घर आतिथ्य स्वीकार करने में लगा है विचारों की खूंटियों पर-टंगी बैसाखियाॅं लिये, खादी के लकझक कवर से ढकी- सोफा संस्कृति पर पसरा राष्ट्र पे्रम,मांसल जिस्मों के- अन्तर्राष्ट्रीय भूगोल का ज्ञाता बन आदिवासी सौंदर्य शास्त्र पर- भाषण तैयार करने में जुटा है कुम्हार के घूमते चाक पर- कुशल उॅंगलियों से आकार लेती मिट्टी- पुरा संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है- और मिट्टी के माधों, अपसंस्कृति का- चश्मा लगाये- कला पारखी होने का ढोंग करने में व्यस्त हैं- नियान लाइट/चमगादड़ों में फंसा-चाॅंद/सूरज पूर्ववत बैसाखी लगे विचारों से- अपनी मूक छटपटाहट........व्यक्त करने में लगा है, .......मात्र ...छटपटाहट।
आपके दो कहानी संग्रह -- चन्दनवन की राख , तथा द्रोणाचार्य का क्लोन प्रकाशित हो चर्चित हो चुके हैं , ‘ इस प्रकार, हिन्दी साहित्य को, भोलानाथ त्यागी का अवदान महत्वपूर्ण है।
बीसवीं शती के हिंदी साहित्य संवर्धन में जनपद बिजनौर का योगदान --
डॉ उषा त्यागी-----
‘बिजनौर जनपदीय रचनाकार
और उनका सर्वेक्षणात्मक परिचय...
विनीत प्रकाश गर्ग ‘हुड़दंग नगीनवी‘
साहित्य जगत में ‘ हुड़दंग नगीनवी, के नाम से चर्चित विनीत प्रकाश गर्ग का जन्म 2 मई सन् 1959 को काशीपुर में हुआ। आपके पिता का नाम जयप्रकाश अग्रवाल एवं माता का नाम उमा अग्रवाल हैं। विनीत कुमार गर्ग ने, एम0ए0 एल0एल0बी0 की उपाधि प्राप्त की हैं।
‘हुड़दंग नगीनवी‘ ने काव्य में हास्य-व्यंग्य के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान स्थापित की हैं। आपकी ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित हो, पाठकों को गुदगुदा चुकी है। राष्ट्रीय स्तर पर आपकी रचनाऐं प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। ‘हुड़दंग का हुड़दंग के हंसगुल्ले‘,‘ हुड़दंग के धमाके‘,‘ छक्के छूट गयें‘,‘ रंग और व्यंग्य हुड़दंग के संग,‘‘ खाट खड़ी करवा लो‘, ‘हास-परिहास‘,‘गुदगुदी‘,‘ हुड़दंग की फुलझड़ियाॅं‘ आदि हास्य-व्यंग्य के संग्रह भरपूर चर्चित हुए हैं। सम्प्रति प्रकाशन-मुद्रण व्यवसाय से जुड़े हैं।
कवि सम्मेलनों में, ‘हुड़दंग नगीनवी‘ की हास्य-व्यंग्य रचनाएॅं श्रोताओं को बरबस ठहाका लगाने को विवश कर देती हैं। आपकी भाषा -शैली अपकी विधा के साथ पूर्ण न्याय करती है। ‘हुड़दंग नगीनवी‘ ने, अपनी लेखनी के माध्यम से ,नगीना को राष्ट्रीय स्तर पर साहित्यिक पहचान दिलाई है। हास्य-व्यंग्य के वह, एक सशक्त हस्ताक्षर हैं।
स्वदेश मण्डावरी
स्वदेश मण्डावरी का जन्म 1 जुलाई सन् 1965 को नगीना (बिजनौर) उ0प्र0 में हुआ। आपने बी0ए0, साहित्यरत्न की उपाधि प्राप्त की। लेखन अभिरूचि स्वदेश जी में विद्यार्थी जीवन में ही जाग्रत में ही जाग्रत हो गई थी, तभी से आपसे लेखनी द्वारा अभिव्यक्ति आरम्भ की। हास्य-व्यंग्य, क्षणिकाएॅं आपकी मुख्य विधा हैं। स्वदेश मण्डावरी की रचनाएॅं प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशित होती रही हैं। फीचर्स एजेन्सियों के माध्यम से रचनाओं का प्रकाशन हुआ है। आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रांे से झलकियों का प्रसारण हुआ हैं। ‘ नवाब साहब की तलवार‘,‘डब्ल्यू0 टी‘,‘पासा पलट गया‘,‘रांग नम्बर‘,‘मायके का चक्क्र‘, नामक झलकियाॅं आकाशवाणी से प्रसारित हों,श्रोताओं को गुदगुदाती रही हैं। हास्य व्यंग्य रचनाओं का कैसिट ‘सुनते रहिये‘ शीर्षक से जारी हुआ। लघु काव्य रचनाएॅं, क्षणिकाएॅं, सीपीकाएॅं आदि पाठकों को विशेष शैली में गुदगुदाती रही हैं। स्वदेश जी ने अपनी लेखनी के माध्यम से हिन्दी साहित्य में, व्यंग्य-हास्य के संदर्भ में अपनी एक विशिष्ट पहचान बना, उल्लेखनीय साहित्य सेवा की है। आपकी भाषा-शैली, व्यंग्य विधा के अनुरूप चुटीली होती है। संक्षेप में आप, बहुत बड़ा कटाक्ष, व्यंग्य सहजता के साथ कर जाते हैं। आपके साथ जया मण्डावरी का नाम भी, हिन्दी साहित्य सेवा हेतु चीन्हा जाता है।
आनन्द कुमार ‘गौरव‘
आनन्द कुमार ‘गौरव‘ का जन्म 12 दिसम्बर सन् 1958 को ग्राम अकबरपुर रेहनी (बिजनौर) में हुआ। आपके पिता का नाम श्री जगराज सिंह एवं माता का नाम श्रीमती शकुन्तला देवी था। स्नातक स्तर तक, शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त संप्रति बै।क अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं। कविता, गीत, ग़ज़ल, कहानी, लघुकथा एवं उपन्यास विधा में आनन्द कुमार गौरव का लेखन, समान रूप से होत है। प्रकाशित होने वाली कृतियों में,‘आॅंसूओं के उस पार‘ (उपन्यास), ‘शून्य के मुखौटे‘ (कविताऐं) तथा ‘अॅंधेरो के पांव‘(ग़ज़ले) प्रमुख हैं। आनन्द कुमार गौरव केा अनेक सामाजिक एवं साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मान, पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। अनेक साहित्यिक संस्थाओं से सक्रिय रूप में सम्बद्ध है। कादम्बिनी, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, माधुरी ,धर्मयुग आदि पत्र-पत्रिकाओं में अनेक रचनाएॅं प्रकाशित हो चुुकी है तथा आकाशवाणी से प्रसारण हुए हैं। गौरव की कविताएॅं भी प्रभावोत्पादक हैं-
सोचता हूॅं जिंदगी तुझको नया उपहार क्या दूं टूटते संदर्भ को जुड़ने का अब आधार क्या दूं आस्थाएॅं खो गई हैं, अनुभवों की जटिलता में फूल भी कांटे हुए हैं, नीतियों की विफलता में मैं तिरस्कृत धारणा को अब नया व्यवहार क्या दूं।
× × × पतले है पल-पल ,पग-पग पर अलगाव टूट गई नेह की नाव सांसों की स्वर-मृदुता भटक गई है प्रेरकता की क्षमता सिमट गई है आज बहुत पीड़ित हैं सुधि के अनुभव ,
सुरेशचन्द्र शर्ता हरितवाल
सुरेश्चन्द्र शर्मा का जन्म 1 अक्टूबर सन् 1952 को ग्राम सीकरी बुजुर्ग, वाया नहटौर (बिजनौर) में हुआ। आपके पिता का नाम स्व0 दिलावर दत्त शर्मा एवं माता का नाम विमला शर्मा है। सुरेशचन्द्र शर्मा ने अपनी लगन, मेहनत से विषम परिस्थितियों में एम0 ए0, बी0 एड0 की उपाधि प्राप्त की। सम्प्रति , राजकीय इन्टर कालेज बिजनौर (उ0प्र0) में, अर्थशास्त्र विषय के प्रवक्ता हैं। सुरेशचन्द्र शर्मा का लेखन वर्ष 1974-75 से आरम्भ हुआ। आत्मसन्तुष्टी, परदुखकातरता लिखने को विवश करती है। लेखन की प्रिय विधाओं में गीत, ग़ज़ल एवं कविताएॅं हैं। शर्मा जी के शब्दों में-‘जब मन का लावा फूटता है, तो शब्दों को आकार मिलता जाता हैं........मेरे लिये भूख-प्यास, आशा-निराशा और विश्वास व प्यार का सन्देश देती है कविता। प्रेम, सत्य, आत्मा व परमात्मा का एकाकार कराती है-कविता........।‘ सुरेशचन्द्र शर्मा की कविता का एक उदाहरण दृष्टव्य है- ये बस्ती हिन्दुओं की है, ये मुसलमानेों की कोई बस्ती नहीं है, मगर इन्सानों की। विसंगातियों, विडम्बनाओं पर अपना आक्रोश अभिव्यक्त करते हुए, कवि की लेखनी संयत रहती हैं। भाषा परिपक्व है। रचनाओं में आम आदमी का दर्द, प्रस्फुटित हुआ है।
भोलानाथ त्यागी
भोलानाथ त्यागी का जन्म 4 नवम्बर सन् 1953 को ग्राम सीकरी बुर्जुग, वाया नहटौर, जनपद बिजनौर (उ0प्र0) में हुआ। आपके पिताश्री का नाम स्व0 रामेश्वर प्रसाद त्यागी, एवं माता का नाम स्व0 देवकी त्यागी था। आपके पिता, उत्तर-प्रदेश शासन में कृषि विभाग के, वरिष्ठ अधिकारी थे- लेकिन सात वर्ष की अल्पायु में, भोलानाथ त्यागी , पिता के साये से वंचित हो गये। आपका , पालन- पोषण, शिक्षा-दीक्षा अपने ननिहाल-ग्राम पैंजनियाॅं (बिजनौर) में, सम्पन्न हुई। आपके नाना श्री शिवचरण ंिसंह (1896-1985), विख्यात स्वाधीनता सैनानी, समाज सेवी, साहित्य प्रेमी थे। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में, उनकी क्रांतिकारी भूमिका, राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रही। विख्यात पत्रकार, राष्ट्रभक्त स्व0 गणेश शंकर विद्यार्थी से शिवचरण सिंह की गहन आत्मीयता थी। विद्यार्थी जी के माध्यम से , काकोरी काण्ड के क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह एवं अश्फाकउल्लाह खाॅं ने ग्राम पैंजनियाॅं में शिवचरण सिंह के संरक्षण में अज्ञातवास किया था। बम्बई में अंग्रेज गर्वनर पर बम फैंकने वाले, कं्रातिकारी अप्पाराव भी महाराज बड़ौदा के निर्देश पर पैंजनियाॅं ग्राम में अज्ञातवास में रहे। मिदनापुर (पश्चिम बंगाल) के क्रान्तिकारी वकील अवनीकांत मुकर्जी, पंजाब के क्रान्तिकारी वकील रामसिंह तथा चुन्नी लाल आदि ने भी अज्ञातवास किया। शिवचरण सिंह ने क्रान्तिकारी को हथियार सप्लाई करने हेतु तिब्बत, अफगानिस्तान, श्रीलंका आदि की गुप्त यात्राऐं की। भोलानाथ त्यागी के नाना श्री शिवचरण सिंह, साबरमती आश्रम में, महात्मा गाॅंधी के सानिध्य में भी रहे। सरदार बल्लभभाई पटेल, मदन महोन मालवीय, रवीन्द्रनाथ टैगोर, अरविन्द घोष, साधु टी0 एल0 वास्वानी , जैसे महापुरूषों से आपका निकट सम्पर्क रहा । हिन्दी साहित्य सेवी स्व0 पं0 पद्म सिंह शर्मा (तुलनात्मक आलोचना के जनक) शिवचरण सिंह जी के परिजन थे। इस कारण मुंशी प्रमचन्द्र, हजारी प्रसाद द्विवेदी, जैनेन्द्र कुमार जैन, बनारसीदास चतुर्वेदी, जैसे विद्वान भी आपके घर आते-जाते रहे। स्वाभाविक ही था कि, ऐसे में अपने नाना श्री के संस्कारों का प्रभाव, भोलानाथ त्यागी के बाल मन पर पड़ा । त्यागी जी की आरम्भिक शिक्षा ग्राम पैंजनियाॅं में,स्नातक उपाधि चान्दपुर (बिजनौर) से प्राप्त की। एल-एल0 बी0 की उपाधि आगरा विश्वविद्यालय से प्राप्त करने के उपरान्त, राजनीति शास्त्र एवं हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि, रूहेलखण्ड विश्वविद्यालय, बरेली से प्राप्त की। हिन्दी साहित्य की अप्रतिम सेवा हेतु आपको विद्यावाचस्पति,पी -एच0 डी0 की मानद उपाधि (सन्1984) से भी अलंकृत किया जा चुका है। सन्1970 में आपने, अपनी अभिव्यक्ति को कलम के माध्यम से दिशा प्रदान की। आपकी पहली रचना, कालेज पत्रिका में प्रकाशित हुई। उसके पश्चात साहित्य सृजन का अनवरत सिलसिला जारी हो गया।
कहानी, कविता, लघुकथा, व्यंग्य, नाटक, रूपक, रिपोर्ताज, वार्ता, समीक्षा, संस्मरण, ग़ज़ल, गीत, समसामयिक लेख, क्षणिका आदि हिन्दी साहित्य की अनेक विधाओं में भोलानाथ त्यागी ने समान रूप से सृजन किया है। राष्ट्रीय स्तर पर आपकी पहचान मुख्यतया-लघुकथा, कहानी , व्यंग्य एवं समीक्षा विधा में की जाती है। देश के प्रतिष्ठित लघुकथा लेखकों में, त्यागी जी का नाम प्रमुखता से लिया जाता हैै। देश की लगभग सभी महत्वपूर्ण हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में, आपकी रचनाएॅं प्रकाशित होती रही हैं। आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से, कहानी, वार्ता, रूपक, काव्यपाठ आदि के शताधिक प्रसारण हो चुके हैं। अनेक कहानियों का पुनप्र्रसारण भी हुआ है। दूरदर्शन दिल्ली एवं लखनऊ केन्द्रों से टेलीकास्ट हुआ हैं। अब तक कुल मिला कर, भोलानाथ त्यागी की लगभग एक सहस्त्र से अधिक रचनाओं का स्फुट प्रकाशन एवं प्रसारण हो चुका है।
भोलानाथ त्यागी के आत्मकथ्यानुसार-‘.........ब
आपके दो कहानी संग्रह -- चन्दनवन की राख , तथा द्रोणाचार्य का क्लोन प्रकाशित हो चर्चित हो चुके हैं , ‘ इस प्रकार, हिन्दी साहित्य को, भोलानाथ त्यागी का अवदान महत्वपूर्ण है।

बहुत सुंदर। बिजनौर पर की गई पीएचडी अलग विश्लेषण की मांग करती है। बिजनौर के साहित्य संवर्धन में आप दोनों का योगदान अनुपम है। मेरी शुभकामनाएं।
ReplyDelete