अपेक्षा
तुम मझे खून दो-
मैं तुम्हें आजादी दूंगा,
का उद्घोष आज
बदल गया है,।
लोकतन्त्र में खुलेआम-
धिक्कार एंव थू-थू हो रही है,
बेंचारा मतदाता/अपनी नियति देख
सिहर रहा है,
तुम हमें वोट दो-
हम तुम्हारा खून पियेगें,
की भावना लिये,
वोटों के खूंखवार शिकारी
व्यस्त हैं, घात लगाने में
और ‘सत्यम’ के ‘असत्य’-
सामने हैं,
तथाकथित बुद्धिजीवि का चिंतन,
भूखा बिलबिला रहा है,
बेसिक षिक्षा पोलियो ग्रस्त है
एंव उच्च षिक्षा-
लाला की तिजोरियों में
शीर्षासन कर रही है
षिक्षण सस्ंथान/
व्यवसायिक परिसर में-
बदल चुके हैं-
मंचो से मधुर स्वर में
गुनगुनाये जाते शब्द,
कविता मान लिये जाते हैं
जबकि ‘कविता’
गांव के जीर्ण-क्षीर्ण विद्यालय में
मिड-डे-मील अपनी थाली में संजोये
दलिये और खिचड़ी में तिरते
कीडे बीन रही है,
और यह कीडे/सारी व्यवस्था में
गिजबिजा रहें है
सठियाये लोकतन्त्र की यह-
उपलब्धि-,
गर्व का विषय है/अथवा शर्म का
इसमें उलझी
नेताजी सुभाष की भावना
का चीत्कार, बहरे हो चुके कानों तक
यदि सुनाई दे सका-
तो आज का दिन सार्थक होगा,
अन्यथा/कविता तो
पूर्वक्त भूखी ही सो जायेगी
अपनी निराषा के साथ
- भोलानाथ त्यागी
तुम मझे खून दो-
मैं तुम्हें आजादी दूंगा,
का उद्घोष आज
बदल गया है,।
लोकतन्त्र में खुलेआम-
धिक्कार एंव थू-थू हो रही है,
बेंचारा मतदाता/अपनी नियति देख
सिहर रहा है,
तुम हमें वोट दो-
हम तुम्हारा खून पियेगें,
की भावना लिये,
वोटों के खूंखवार शिकारी
व्यस्त हैं, घात लगाने में
और ‘सत्यम’ के ‘असत्य’-
सामने हैं,
तथाकथित बुद्धिजीवि का चिंतन,
भूखा बिलबिला रहा है,
बेसिक षिक्षा पोलियो ग्रस्त है
एंव उच्च षिक्षा-
लाला की तिजोरियों में
शीर्षासन कर रही है
षिक्षण सस्ंथान/
व्यवसायिक परिसर में-
बदल चुके हैं-
मंचो से मधुर स्वर में
गुनगुनाये जाते शब्द,
कविता मान लिये जाते हैं
जबकि ‘कविता’
गांव के जीर्ण-क्षीर्ण विद्यालय में
मिड-डे-मील अपनी थाली में संजोये
दलिये और खिचड़ी में तिरते
कीडे बीन रही है,
और यह कीडे/सारी व्यवस्था में
गिजबिजा रहें है
सठियाये लोकतन्त्र की यह-
उपलब्धि-,
गर्व का विषय है/अथवा शर्म का
इसमें उलझी
नेताजी सुभाष की भावना
का चीत्कार, बहरे हो चुके कानों तक
यदि सुनाई दे सका-
तो आज का दिन सार्थक होगा,
अन्यथा/कविता तो
पूर्वक्त भूखी ही सो जायेगी
अपनी निराषा के साथ
- भोलानाथ त्यागी