Thursday, July 8, 2021

 व्यंग्य  -  " विसंगतियों का कालखंड "

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                     - भोलानाथ त्यागी 


              जब विसंगतियां , जीवन   में संगत देने लगती हैं , तब आगे चलकर  यह  समुचा कालखंड  "विसंगतियों का कालखंड " सिद्ध हो  , इतिहास का हिस्सा बन जाता है । वर्तमान में भी यही सब चल रहा है ।


     लकड़हारे अपनी कुल्हाडियां  संभाले ऑक्सीजन उत्पादन पर बहस करने में व्यस्त हैं , वेश्याएं चरित्र के अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में सहभागिता सुनिश्चित कर रही हैं , अपराधी , समाज को अपराध मुक्त बनाने हेतु , गठित आयोग का अध्यक्ष पद पाने  हेतु आतुर हैं । और इन सब के बीच चिर कुवारें  "सफल दांपत्य " पर लिखित , अपनी पुस्तक का विमोचन करा रहे हैं । सत्ता शब्द को शुद्ध ना लिख सकने वाले जीव , सत्तारूढ़ हैं । जिन आंदोलन जीवियों  की अक्ल सिर्फ , बक्कल उतारने तक सिमटी हो , वह अपने बक्कल बचाने की जुगत में हैं ।


     जिनका अपना कोई इतिहास नहीं रहा है , वह इतिहास संरक्षण के पुरोधा बने बैठे हैं , दूसरों के द्वारा पकाई गई खीर की हांडी , अपने चूल्हे पर रख तस्माई  स्वाद पर प्रवचन करने वाला वर्ग ,पाक कला का विशेषज्ञ मान लिया जाता है । 


इस गांधारी युग में विदुर का  बथुआ और  अर्जुन की छाल का अनोखा सामंजस्य ऐसा लगता है जैसे विवेकी राय के ललित निबंध और रविंद्र नाथ त्यागी के व्यंग्य एक ही चाशनी में घोट दिए गए हों और फिर इस चाशनी से बाहर जो पदार्थ निकलता है , उसे चख कर सभी चहक उठते हैं । 


खंड खंड भोगे जा रहे  कोरोना कालखंड में दवाई हेतु तरसाव  व्याप्त है और दारू की होम डिलीवरी का प्रबंध वाहवाही बटोर रहा है । दवा - दारू का यह मणिकांचन संयोग , कल्पनातीत  है ।


देश का प्रथम नागरिक, अपनी सैलरी और कराधान व्यवस्था से व्यथित है ,  जनपद के प्रथम नागरिक की पदवी प्राप्त करने हेतु, किए गए कर्मकांड समुचे  प्रांत में गूंज रहे हैं। इस व्यवस्था में जिस अलोकतांत्रिक ढंग से , लोकतंत्र भरतनाट्यम कर रहा है , वह सीता के स्वर्ण मृग प्राप्त करने की लालसा को सही सिद्ध कर देता है ।


सत्तान्नोमुख प्रशासन हमेशा अपने आकाओं के फरमान , बजाने में सिद्धहस्त माना जाता है । डंडा प्रत्येक कालखंड में वही रहता है बस आस्थाओं के साथ झंडा मात्र बदलना होता है , और इस प्रक्रिया में ब्यूरोक्रेसी का कभी कोई सानी नहीं रहा है । वाहन चलाने हेतु लुंगी को वैधानिक पोशाक नहीं माना गया है , लेकिन शासन लुंगी धारण कर बखूबी चलाया जा सकता है । जहां तक चित्रपट जगत का सवाल है तो वहां लुंगी डांस काफी पहले से प्रतिष्ठित है । अब लुंगीडांस  समाज को अपने आगोश में ले चुका है । कोई भी सक्षम अधिकारी कभी भी त्वरित निर्णय लेने की भूल नहीं करता , यदि पीड़ित जनसामान्य उसे अपनी समस्याओं से अवगत कराते हुए , कोई आवेदन देता है - तो उसे वह अपने अधीनस्थ को जांच उपरांत आख्या और उचित कार्रवाई हेतु थमा देता है । और बस इसी के साथ समस्या की अंतिम क्रिया संपन्न हो जाती है । उच्च अधिकारी अधीनस्थ को फाइल पर 'देखें की टिप्पणी देता है और  अधीनस्थ  फाइल  पर  'देखा ' टीप देता  है । और इस देखें और देखा के बीच फाइल में दबी समस्या , स्वयं शांत हो जाती है । ईमानदारी और सिद्धांत , गुजरे जमाने की बात हो चुकी है , अब तो जिसे बेईमानी का मौका नहीं मिलता वह ईमानदारी का मुखौटा धारण कर लेता है तथा सिद्धांतहीन होना ही , आज का सिद्धांत हो गया है ।


न्यायाधीश ,सत्ता हेतु किसी भी समस्या के निस्तारण हेतु समय सीमा निर्धारित करते हैं, लेकिन न्याय प्रदान करने  में स्वयं के लिए कोई समय सीमा नहीं होती । यही विरोधाभास न्यायहंता बन जाता है । सेवानिवृत्ति के उपरांत मलाई चाटने की आकांक्षा में तथाकथित न्यायालय , सत्ता के इशारे पर मुजरा करने लगते हैं और बस यहीं से कोठागिरी आरंभ हो जाती है । सत्ता के दलाल बरबस खीसें दिखाने लगते हैं । शिक्षा व्यवस्था संकटग्रस्त हो स्वयं को , निशंक सिद्ध करने में लगी है । शिक्षा की  मूल भावना को स्ववित्तपोषित व्यवस्था के माध्यम से , भ्रूण हत्या कर , आगामी सभी आशंकाओं को समाप्त कर दिया जाता है । सत्ता को हमेशा खतरा शिक्षित समाज से होता है , अपने गंभीर प्रयासों द्वारा सत्ता,  अशिक्षा के प्रसार में कभी कोई कसर नहीं छोड़ती । रही सही कमी , कोरोना  पूरी कर देता है ।


परिवार को विस्तारित ना कर पाने की कसक, अपने  मंत्रिमंडल को विस्तारित कर पूरा करने का प्रयास किया जाता है । हमारे देश को ठगने में सिद्धहस्त लॉर्ड विलियम बेंटिग ने अपने समय में ठगों का समापन कर दिया बताते थे । लेकिन यह विद्या आज समूची राजनीति में व्याप्त हो चुकी है , बनारस के ठग इतिहास प्रसिद्ध रहे हैं । वर्तमान भी इसका सहज  साक्षी है  । जनता को ठगने की संपूर्ण कला , बरास्ता  बनारस ही फलती फूलती है । इस विद्या में निष्णात होने हेतु किसी को भी बनारसी बाबू बनना ही पड़ता है , और बस समूचा देश इसकी जद में आ जाता है ।


विसंगतियों के इस कालखंड पर कुछ लिख पाना भी एक विसंगति से कम नहीं है , क्योंकि अधिकांश कलम  गिरवी रखी हैं और अपने आकाओं की आवश्यकता /  निर्देशानुसार , स्याही को रोशनाई सिद्ध करने का असफल प्रयास करती है।  आसमान से बरसती चैनल संस्कृति , इसी तथ्य का एक सार्थक और सटीक उदाहरण है ।


पहले लोग बाग  सठिया जाते थे , लेकिन आजकल जन्म लेते ही कुर्सियां जाते हैं । एक कुर्सी पाने की लालसा में बुद्धिबल के अलावा सभी कुछ इस्तेमाल किया जाता है , यथा- धनबल ,बाहुबल । बलबलाती राजनीति के इस रेगिस्तान में , कारूं का खजाना पा लेने की होड़ किसी मृगतृष्णा  से कम नहीं मानी जाती । साहित्य  भी  इससे इतर कुछ नहीं है । 


इस संदर्भ में , अंत में यह पंक्तियां देखिएगा -


रहने और ना रहने के बीच ,

जो रहता है - 

वही तो जीवन है ,

वरना तो एक कलश 

घूमता रहता है -

दधीचि की अस्थियों को , 

अपने में समेटे 

मुंगेरीलाल के सपनों सहित , 

चुनावी वज्र बनने की कामना लिए 

घाट घाट , तीरे तीरे ,

धीरे धीरे -

स्वार्थ  साधते रहते हैं , 

राजनीति के समर में 

नरो वा कुंजरो वा के - 

उद्घोष  / जयघोष के 

सनातन कोलाहल सहित ।


                    -- भोलानाथ त्यागी 

             मोबा -7017261904


                49 / इमलिया परिसर ,

                             सिविल  लाइन ,

                            बिजनौर , उ. प्र.


 रेखांकन -  

(  साभार  )

विनायक त्यागी ,

एडवोकेट 

सुप्रीम कोर्ट , नई दिल्ली

Wednesday, September 9, 2015

शोध कार्य -- बीसवीं शती के हिंदी साहित्य संवर्धन में जनपद बिजनौर का योगदान -- डॉ उषा त्यागी-----



शोध कार्य --
बीसवीं शती के हिंदी साहित्य संवर्धन में जनपद बिजनौर का योगदान --
डॉ उषा त्यागी-----
‘बिजनौर जनपदीय रचनाकारऔर उनका सर्वेक्षणात्मक परिचय

अजय जैन
अजय जैन का जन्म 13 नवम्बर सन् 1964 को नजीबाबाद (बिजनौर) में हुआ। आपके पिता का नाम श्री राजेन्द्र कुमार जैन एवं माता का नाम श्रीमती लता जैन है। अजय जैन की शिक्ष एम0काम0, बी0एड0 तक हुई तथा सम्प्रति आप सर्राफा व्यवसाय से जुडे़ हैं। दैनिक जागरण मेरठ संस्करण के आप प्रतिनिधि हैं तथा पत्रकारिता के साथ ही साथ साहित्य सृजन में पूर्ण मनोयोग से जुटे हैं।
‘सन्नाटें मंे गूज‘ तथा ‘हर गीत तुम्हारे नाम‘ कविता संग्रह में आपकी रचनाओं को संकलित किया गया है। राजपुर नवादा (बिजनौर) के दुष्यंत कुमार त्यागी संस्थान द्वारा आपके साहित्य सृजन पर दुष्यंत एवार्ड प्रदान किया जा चुका है। साहित्यिक संस्था ‘कृति‘ के अध्यक्ष एवं ‘परिचय‘ संस्था के कार्यक्रम संयोजक के रूप में अजय जैन पर्याप्त चर्चित हो चुके हैं। आकाशवाणी से रचनाओं का प्रसारण होता रहा हैं। उनकी एक कविता का उदाहरण प्रस्तुत है-
अवसादों के काले बादल
सतरंग कर जा होली में
प्रेम के रंग से रंगकर कोई
गीत सुना जा होली में प्रीत रीत के भाव ह्रदय में
आज जगा जा होली में
तन भीगे, मन भीगे ऐसा
रंग जा, आजा होली में।
मुकेश ‘नादान‘
मुकेश ‘नादान‘ का जन्म 5 नवम्बर सन् 1964 को नजीबाबाद में हुआ। आपके पिता का नाम श्री लक्ष्मण सिंह वर्मा तथा माता का नाम श्रीमती सावित्री देवी है। मुकेश ‘नादान‘ की शिक्षा स्नातक स्तर तक सम्पन्न हुई। तत्पश्चात आप, नजीबाबाद में ही व्यापार एवं प्रकाशन संस्थान से जुडें़ हैं।
हास्य व्यंग्य आपकी प्रमुख विधा है तथा इसके ही चित्रकला में भी गहन अभिरूचि है। ‘आओ हंसकर देखे‘ तथा ‘जब भी कुछ कहना चाहा‘ शीर्षक काव्य फोल्डर के अतिरिक्त मुकेश ‘नादान‘ साहित्य दर्पण‘ शीर्षक सचित्र काव्य फोल्डर के माध्यम से अपनी प्रतिभा का एक उदाहरण हैं।
हास्य-व्यंग्य कविता का एक उदाहरण दृष्टव्य है-
हमने मौहल्ले के
नत्थू/फत्तू को-
इकठ्ठा कर
एक सम्मान समिति बनाई थी,
हर महीने अपना सम्मान करवा
अपनी समिति से-
काम चला रहे है,
वर्षाें पहले एक शाॅल खरीदी थी-
कभी नत्थू से/कभी फत्तू से
उसे अपने ऊपर डलवा रहे हैं
यह क्रम जारी रहेगा-
हमारे ऊपर
अन्तिम चादर चढ़ने तक।
किरणपाल सिंह ‘मयंक‘
श्री मांगे सिंह एवं स्व0 श्रीमती शान्ति देवी के पुत्र रत्न किरणपाल सिंह ‘मयंक‘ का जन्म, दिनांक 10 मई सन् 1967 को ग्राम गडीना जिला मेरठ में हुआ। आपकी शिक्षा, एम0ए0, बी0एड0 तक सम्पन्न हुई। सम्प्रति मूर्ति देवी सरस्वती इन्टर कालिज, नजीबाबाद में सहायक अध्यापक हैं।
किरणपाल सिंह ‘मयंक‘ भारती साहित्य कला संस्कृति संस्थान, नजीबाबाद से सक्रियता से जुडे़ हैं तथा स्थानीय कवि गोष्ठी में भाग लेते रहे हैं। आपने साहित्य को विभिन्न विधाओं में सृजन किया है। लेकिन काव्य आपकी प्रमुख एवं प्रिय विधा रही है। गीत, गजल व दोहों के माध्यम से, मयंक को अपनी अभिव्यक्ति सार्थक लगती है।
आत्म प्रचार से दूर, बिना शोर-शराबे के साहित्य की अपनी अनवरत सेवा देने वाला यह कवि अभी तक किसी संकलन में प्रकाशित नहीं हुआ हैं। कतिपय रचनाऐं स्फुट रूप में प्रकाश में आ चुकी हैं, लेकिन अपनी रचनाओं के माध्यम से यह कवि आश्वस्त करता है कि साहित्य सृजन के द्वारा उसकी भावपूर्ण अभिव्यक्ति पाठक और श्रोता को झकझोरने में सफल है।
दिनेश खन्ना
दिनेश खान्ना का जन्म 30 नवम्बर सन् 1968 को नजीबाबाद में हुआ। आपके पिता का नाम श्री कृष्ण कुमार खन्ना एवं माता का नाम स्व0 श्रीमती प्रभा खन्ना हैं। हाई स्कूल स्तर तक शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त आप व्यवसाय से जुड़ गये।
नजीबाबाद की साहित्यिक संस्थाओं यथा-अभिव्यक्ति, युग हस्ताक्षर, परिचय, हस्ताक्षर आदि में दिनेश खन्ना की सक्रिय भागीदारी बनी रहती है। साहित्य के संदर्भ में काव्य में आपकी गहन रूचि है। हिन्दी गजल के माध्यम से, दिनेश खन्ना ने अभिव्यक्ति की है। एक उदाहरण प्रस्तुत है-
ता उम्र तेरी आँख का काजल न बन सका
नजरों से मुझको आपने, आखिर गिरा दिया
ठोकर लगाई आपने, और हँस के चल दिये
तुमने मेरी वफा का ये अच्छा सिला दिया
पूछा जो मैंने उससे, कहाँ पर है जिन्दगी
उसने तुम्हारे गाँव का रस्ता दिखा दिया।
×××
सबकी तमाम कोशिशें, बेकार हो गई
उसने मुझे मनाया, तभी हो गई गजल
जिसने तमाम उम्र संवरने नहीं दिया
वो दर्द याद आया, तभी हो गई गजल।
दिनेश खन्ना का शब्द-शिल्प-उनकी गजल, कविता, मुक्तक में-पाठक/श्रोता को झकझोरता है।
प्रमोद कुमार जैन
आपका जन्म 30 जुलाई सन् 1970 को मुज्फ्फरनगर (उ0प्र0) में हुआ। आपके पिता का नाम श्री हरिकिशन एवं माता का नाम सोहनवीरी है। प्रमोद कुमार की शिक्षा एम0एस0सी0, बी0एड0 उपाधि स्तर तक सम्पन्न हुई। सम्प्रति, मूर्ति देवी सरस्वती इन्टर कालेज, नजीबाबाद में अध्यापक के रूप में कार्यरत हैं।
हिन्दी साहित्य में प्रमोद कुमार ‘प्रेम‘ ने गीत, गजल के माध्यम से अपनी रचनात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। भारती साहित्य कला संस्कृति संस्थान, नजीबाबाद से आपका सक्रिय संबध है। आपकी रचनाओं स्फुट प्रकाशन, प्रसारण हुआ है। सामाजिक विसंगतियों पर तथा व्यवस्था के तौर-तरीके पर प्रमोद कुमार प्रेम ने अपनी रचनाओं द्वारा करारा कटाक्ष किया है। उदाहरणार्थ, उनकी अग्रांकित पंक्तियाँ
‘ऐ वतन, मेरे प्यारे वतन
परमाणु बम बना
हम कितनी उन्नति कर गये
ये ना हमने सोचा कभी
भूख से बच्चे कितने मर गये
ऊँचाइयों पर संसार की
बस रहे तेरा नाम
ऐ वतन, मेरे प्यारे वतन........।
प्रमोद कुमार प्रेम में साहित्यिक संदर्भ में अनन्त सम्भावनाएँ, करवट बदलती लगती है। लेकिन शब्द विन्यास, भाषा-शैली में, रचनाकार की लेखन प्रक्रिया की आरम्भिक गंध व्याप्त है।

Monday, September 7, 2015

लघु कथा

लघु कथा
भविष्य
‘देश के नौनिहालों से हमें बहुत आशायें है......शिक्षा के द्वारा चरित्र का विकास होता है, सत्य निष्ठा..... और नैतिकता द्वारा बच्चों में राष्ट्र प्रेम जागृत होता है..... इसी में देश का भविष्य सुरिक्षत है।’
राष्ट्रीय पर्व पर, एक शिक्षण संस्था में नेताजी, समारोहपूर्वक उवाच रहे थे। तालियों की गड़गड़ाहट से, आसमान गूंजने लगा। समारोह स्थल के बाहर, फटेहाल बच्चे सड़क पर पड़ा कचरा बीन रहे थे। उनकी आंखो में उतर आई भूख से, देश के सुंदर भविष्य की कल्पना धंुधला गई। उनकी ओर किसी का ध्यान नहीं गया था।
तभी, नैपथ्य में एक स्वर उभरा-
‘वाह, नेता जी..... आपका भविष्य तो कुर्सी में सुरक्षित है...... विदेशी बैंक खाते लबालब भरे हैं....... चरित्र और नैतिकता की दुहाई किस काम की........ देश का भविष्य आज भी कचरा बीन रहा है...... कभी देखा है, इस और भी......।
और यह स्वर श्रोताओं की कहीं गहरे तक मर्माहत कर गया।
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‘गुनाह’
तेज गर्मी पड़ रही थी। आंखों पर धूप का चश्मा, गरदन और गले में छिड़के गये पाउडर की रंगत सैन्ट और पसीने की मिली जुली गन्ध लिये, एक रूपसी खचाखच भरी सिटी बस में यात्रा कर रही थी। स्लीवलैस ब्लाउज पहले, अपना संतुलन बनाये रखने के लिये, बस की छत मे लगी राड़ को, हाथ से थाम रखा था। सभी यात्री चोर निगाहों से इस दृश्य के रसास्वादन में लीन थे।
स्टाप आने पर काफी परिश्रम के पश्चात , वह रूपसी बस की भीड़ से मुक्ति प्राप्त कर नीचे उतर पाई। कन्धे से झूलते बैग से , नीले रंग का प्रिन्टेड छाता निकाल कर , खोला और गन्तव्य की और कदम बढ़ाये।
तभी बस में बैठे एक युवा ने फिकरा कसा-‘........ वहा रे नीली छतरी वाले, तेरा भी जबाव नहीं.............।’
पास बैठे एक बर्जुग ने उसे लताड़ा था-‘........शर्म आनी चाहिए....... ऐसी छेड़-छाड़ तुम्हें शोभा नही देती....।’
युवा ने सफाई दी-.........बाबा ......शर्म किस बात की....... नीली छतरी वाले , भगवान को याद करना क्या गुनाह है?.......।’ तभी बस चल पड़ी थी।
बूढ़े बाबा, अपना सिर खुजला रहें थे।
----- भोलानाथ त्यागी
Mob ---- 09456873005
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शोध कार्य -- बीसवीं शती के हिंदी साहित्य संवर्धन में जनपद बिजनौर का योगदान -- डॉ उषा त्यागी-----

शोध कार्य --
बीसवीं शती के हिंदी साहित्य संवर्धन में जनपद बिजनौर का योगदान --
डॉ उषा त्यागी-----
‘बिजनौर जनपदीय रचनाकार
और उनका सर्वेक्षणात्मक परिचय...

विनीत प्रकाश गर्ग ‘हुड़दंग नगीनवी‘
साहित्य जगत में ‘ हुड़दंग नगीनवी, के नाम से चर्चित विनीत प्रकाश गर्ग का जन्म 2 मई सन् 1959 को काशीपुर में हुआ। आपके पिता का नाम जयप्रकाश अग्रवाल एवं माता का नाम उमा अग्रवाल हैं। विनीत कुमार गर्ग ने, एम0ए0 एल0एल0बी0 की उपाधि प्राप्त की हैं।
‘हुड़दंग नगीनवी‘ ने काव्य में हास्य-व्यंग्य के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान स्थापित की हैं। आपकी ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित हो, पाठकों को गुदगुदा चुकी है। राष्ट्रीय स्तर पर आपकी रचनाऐं प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। ‘हुड़दंग का हुड़दंग के हंसगुल्ले‘,‘ हुड़दंग के धमाके‘,‘ छक्के छूट गयें‘,‘ रंग और व्यंग्य हुड़दंग के संग,‘‘ खाट खड़ी करवा लो‘, ‘हास-परिहास‘,‘गुदगुदी‘,‘ हुड़दंग की फुलझड़ियाॅं‘ आदि हास्य-व्यंग्य के संग्रह भरपूर चर्चित हुए हैं। सम्प्रति प्रकाशन-मुद्रण व्यवसाय से जुड़े हैं।
कवि सम्मेलनों में, ‘हुड़दंग नगीनवी‘ की हास्य-व्यंग्य रचनाएॅं श्रोताओं को बरबस ठहाका लगाने को विवश कर देती हैं। आपकी भाषा -शैली अपकी विधा के साथ पूर्ण न्याय करती है। ‘हुड़दंग नगीनवी‘ ने, अपनी लेखनी के माध्यम से ,नगीना को राष्ट्रीय स्तर पर साहित्यिक पहचान दिलाई है। हास्य-व्यंग्य के वह, एक सशक्त हस्ताक्षर हैं।

स्वदेश मण्डावरी

स्वदेश मण्डावरी का जन्म 1 जुलाई सन् 1965 को नगीना (बिजनौर) उ0प्र0 में हुआ। आपने बी0ए0, साहित्यरत्न की उपाधि प्राप्त की। लेखन अभिरूचि स्वदेश जी में विद्यार्थी जीवन में ही जाग्रत में ही जाग्रत हो गई थी, तभी से आपसे लेखनी द्वारा अभिव्यक्ति आरम्भ की। हास्य-व्यंग्य, क्षणिकाएॅं आपकी मुख्य विधा हैं। स्वदेश मण्डावरी की रचनाएॅं प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशित होती रही हैं। फीचर्स एजेन्सियों के माध्यम से रचनाओं का प्रकाशन हुआ है। आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रांे से झलकियों का प्रसारण हुआ हैं। ‘ नवाब साहब की तलवार‘,‘डब्ल्यू0 टी‘,‘पासा पलट गया‘,‘रांग नम्बर‘,‘मायके का चक्क्र‘, नामक झलकियाॅं आकाशवाणी से प्रसारित हों,श्रोताओं को गुदगुदाती रही हैं। हास्य व्यंग्य रचनाओं का कैसिट ‘सुनते रहिये‘ शीर्षक से जारी हुआ। लघु काव्य रचनाएॅं, क्षणिकाएॅं, सीपीकाएॅं आदि पाठकों को विशेष शैली में गुदगुदाती रही हैं। स्वदेश जी ने अपनी लेखनी के माध्यम से हिन्दी साहित्य में, व्यंग्य-हास्य के संदर्भ में अपनी एक विशिष्ट पहचान बना, उल्लेखनीय साहित्य सेवा की है। आपकी भाषा-शैली, व्यंग्य विधा के अनुरूप चुटीली होती है। संक्षेप में आप, बहुत बड़ा कटाक्ष, व्यंग्य सहजता के साथ कर जाते हैं। आपके साथ जया मण्डावरी का नाम भी, हिन्दी साहित्य सेवा हेतु चीन्हा जाता है।

आनन्द कुमार ‘गौरव‘

आनन्द कुमार ‘गौरव‘ का जन्म 12 दिसम्बर सन् 1958 को ग्राम अकबरपुर रेहनी (बिजनौर) में हुआ। आपके पिता का नाम श्री जगराज सिंह एवं माता का नाम श्रीमती शकुन्तला देवी था। स्नातक स्तर तक, शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त संप्रति बै।क अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं। कविता, गीत, ग़ज़ल, कहानी, लघुकथा एवं उपन्यास विधा में आनन्द कुमार गौरव का लेखन, समान रूप से होत है। प्रकाशित होने वाली कृतियों में,‘आॅंसूओं के उस पार‘ (उपन्यास), ‘शून्य के मुखौटे‘ (कविताऐं) तथा ‘अॅंधेरो के पांव‘(ग़ज़ले) प्रमुख हैं। आनन्द कुमार गौरव केा अनेक सामाजिक एवं साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मान, पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। अनेक साहित्यिक संस्थाओं से सक्रिय रूप में सम्बद्ध है। कादम्बिनी, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, माधुरी ,धर्मयुग आदि पत्र-पत्रिकाओं में अनेक रचनाएॅं प्रकाशित हो चुुकी है तथा आकाशवाणी से प्रसारण हुए हैं। गौरव की कविताएॅं भी प्रभावोत्पादक हैं-
सोचता हूॅं जिंदगी तुझको नया उपहार क्या दूं टूटते संदर्भ को जुड़ने का अब आधार क्या दूं आस्थाएॅं खो गई हैं, अनुभवों की जटिलता में फूल भी कांटे हुए हैं, नीतियों की विफलता में मैं तिरस्कृत धारणा को अब नया व्यवहार क्या दूं।
× × × पतले है पल-पल ,पग-पग पर अलगाव टूट गई नेह की नाव सांसों की स्वर-मृदुता भटक गई है प्रेरकता की क्षमता सिमट गई है आज बहुत पीड़ित हैं सुधि के अनुभव ,

सुरेशचन्द्र शर्ता हरितवाल

सुरेश्चन्द्र शर्मा का जन्म 1 अक्टूबर सन् 1952 को ग्राम सीकरी बुजुर्ग, वाया नहटौर (बिजनौर) में हुआ। आपके पिता का नाम स्व0 दिलावर दत्त शर्मा एवं माता का नाम विमला शर्मा है। सुरेशचन्द्र शर्मा ने अपनी लगन, मेहनत से विषम परिस्थितियों में एम0 ए0, बी0 एड0 की उपाधि प्राप्त की। सम्प्रति , राजकीय इन्टर कालेज बिजनौर (उ0प्र0) में, अर्थशास्त्र विषय के प्रवक्ता हैं। सुरेशचन्द्र शर्मा का लेखन वर्ष 1974-75 से आरम्भ हुआ। आत्मसन्तुष्टी, परदुखकातरता लिखने को विवश करती है। लेखन की प्रिय विधाओं में गीत, ग़ज़ल एवं कविताएॅं हैं। शर्मा जी के शब्दों में-‘जब मन का लावा फूटता है, तो शब्दों को आकार मिलता जाता हैं........मेरे लिये भूख-प्यास, आशा-निराशा और विश्वास व प्यार का सन्देश देती है कविता। प्रेम, सत्य, आत्मा व परमात्मा का एकाकार कराती है-कविता........।‘ सुरेशचन्द्र शर्मा की कविता का एक उदाहरण दृष्टव्य है- ये बस्ती हिन्दुओं की है, ये मुसलमानेों की कोई बस्ती नहीं है, मगर इन्सानों की। विसंगातियों, विडम्बनाओं पर अपना आक्रोश अभिव्यक्त करते हुए, कवि की लेखनी संयत रहती हैं। भाषा परिपक्व है। रचनाओं में आम आदमी का दर्द, प्रस्फुटित हुआ है।

भोलानाथ त्यागी

भोलानाथ त्यागी का जन्म 4 नवम्बर सन् 1953 को ग्राम सीकरी बुर्जुग, वाया नहटौर, जनपद बिजनौर (उ0प्र0) में हुआ। आपके पिताश्री का नाम स्व0 रामेश्वर प्रसाद त्यागी, एवं माता का नाम स्व0 देवकी त्यागी था। आपके पिता, उत्तर-प्रदेश शासन में कृषि विभाग के, वरिष्ठ अधिकारी थे- लेकिन सात वर्ष की अल्पायु में, भोलानाथ त्यागी , पिता के साये से वंचित हो गये। आपका , पालन- पोषण, शिक्षा-दीक्षा अपने ननिहाल-ग्राम पैंजनियाॅं (बिजनौर) में, सम्पन्न हुई। आपके नाना श्री शिवचरण ंिसंह (1896-1985), विख्यात स्वाधीनता सैनानी, समाज सेवी, साहित्य प्रेमी थे। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में, उनकी क्रांतिकारी भूमिका, राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रही। विख्यात पत्रकार, राष्ट्रभक्त स्व0 गणेश शंकर विद्यार्थी से शिवचरण सिंह की गहन आत्मीयता थी। विद्यार्थी जी के माध्यम से , काकोरी काण्ड के क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह एवं अश्फाकउल्लाह खाॅं ने ग्राम पैंजनियाॅं में शिवचरण सिंह के संरक्षण में अज्ञातवास किया था। बम्बई में अंग्रेज गर्वनर पर बम फैंकने वाले, कं्रातिकारी अप्पाराव भी महाराज बड़ौदा के निर्देश पर पैंजनियाॅं ग्राम में अज्ञातवास में रहे। मिदनापुर (पश्चिम बंगाल) के क्रान्तिकारी वकील अवनीकांत मुकर्जी, पंजाब के क्रान्तिकारी वकील रामसिंह तथा चुन्नी लाल आदि ने भी अज्ञातवास किया। शिवचरण सिंह ने क्रान्तिकारी को हथियार सप्लाई करने हेतु तिब्बत, अफगानिस्तान, श्रीलंका आदि की गुप्त यात्राऐं की। भोलानाथ त्यागी के नाना श्री शिवचरण सिंह, साबरमती आश्रम में, महात्मा गाॅंधी के सानिध्य में भी रहे। सरदार बल्लभभाई पटेल, मदन महोन मालवीय, रवीन्द्रनाथ टैगोर, अरविन्द घोष, साधु टी0 एल0 वास्वानी , जैसे महापुरूषों से आपका निकट सम्पर्क रहा । हिन्दी साहित्य सेवी स्व0 पं0 पद्म सिंह शर्मा (तुलनात्मक आलोचना के जनक) शिवचरण सिंह जी के परिजन थे। इस कारण मुंशी प्रमचन्द्र, हजारी प्रसाद द्विवेदी, जैनेन्द्र कुमार जैन, बनारसीदास चतुर्वेदी, जैसे विद्वान भी आपके घर आते-जाते रहे। स्वाभाविक ही था कि, ऐसे में अपने नाना श्री के संस्कारों का प्रभाव, भोलानाथ त्यागी के बाल मन पर पड़ा । त्यागी जी की आरम्भिक शिक्षा ग्राम पैंजनियाॅं में,स्नातक उपाधि चान्दपुर (बिजनौर) से प्राप्त की। एल-एल0 बी0 की उपाधि आगरा विश्वविद्यालय से प्राप्त करने के उपरान्त, राजनीति शास्त्र एवं हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि, रूहेलखण्ड विश्वविद्यालय, बरेली से प्राप्त की। हिन्दी साहित्य की अप्रतिम सेवा हेतु आपको विद्यावाचस्पति,पी -एच0 डी0 की मानद उपाधि (सन्1984) से भी अलंकृत किया जा चुका है। सन्1970 में आपने, अपनी अभिव्यक्ति को कलम के माध्यम से दिशा प्रदान की। आपकी पहली रचना, कालेज पत्रिका में प्रकाशित हुई। उसके पश्चात साहित्य सृजन का अनवरत सिलसिला जारी हो गया।
कहानी, कविता, लघुकथा, व्यंग्य, नाटक, रूपक, रिपोर्ताज, वार्ता, समीक्षा, संस्मरण, ग़ज़ल, गीत, समसामयिक लेख, क्षणिका आदि हिन्दी साहित्य की अनेक विधाओं में भोलानाथ त्यागी ने समान रूप से सृजन किया है। राष्ट्रीय स्तर पर आपकी पहचान मुख्यतया-लघुकथा, कहानी , व्यंग्य एवं समीक्षा विधा में की जाती है। देश के प्रतिष्ठित लघुकथा लेखकों में, त्यागी जी का नाम प्रमुखता से लिया जाता हैै। देश की लगभग सभी महत्वपूर्ण हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में, आपकी रचनाएॅं प्रकाशित होती रही हैं। आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से, कहानी, वार्ता, रूपक, काव्यपाठ आदि के शताधिक प्रसारण हो चुके हैं। अनेक कहानियों का पुनप्र्रसारण भी हुआ है। दूरदर्शन दिल्ली एवं लखनऊ केन्द्रों से टेलीकास्ट हुआ हैं। अब तक कुल मिला कर, भोलानाथ त्यागी की लगभग एक सहस्त्र से अधिक रचनाओं का स्फुट प्रकाशन एवं प्रसारण हो चुका है।
भोलानाथ त्यागी के आत्मकथ्यानुसार-‘.........बचपन से यथार्थ के धरातल पर नंगे पैर चलने का अनुभव। माॅं सरस्वती की अनुकम्पा से लेखनी, अभिव्यक्ति का माध्यम बनी। साहित्य शौक नहीं, अपितु अतिरिक्त संवेदनशीलता के कारण सामाजिक विसंगतियों के प्रति, आक्रोश, प्रतिक्रिया का विस्फोटन है।‘ सम्प्रति, भोलानाथ त्यागी अपने कृषि फार्म की देखभाल में व्यस्त रहते हुए, भारतीय किसान की भूमिका में सन्तुष्ट नजर आते हैं। साथ ही,‘ शब्दों की खेती‘ भी सफलता पूर्वक सम्पन्न कर, हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं की श्रीवृद्धि, संवर्धन कर रहे है। उनकी रचनाओं में, आम आदमी की पीड़ा को अभिव्यक्ति मिली है। समाज में फैली विसंगतियों पर, आपने पैना व्यंग्य किया है। राष्ट्रीय स्तर पर आपके साहित्यिक सम्पर्क, गहन आत्मीयता से बने हैं। भोलानाथ त्यागी की, भाषा-शैली आकर्षक एवं विषयानुकूल होती है। शब्द भण्डार व्यापक है। उदाहरण दृष्टव्य है- चाॅंद अपना अस्तित्व-तलाश रहा है, नियान लाइट की चकाचैंध में, और सूरज -चमगादड़ों के घर आतिथ्य स्वीकार करने में लगा है विचारों की खूंटियों पर-टंगी बैसाखियाॅं लिये, खादी के लकझक कवर से ढकी- सोफा संस्कृति पर पसरा राष्ट्र पे्रम,मांसल जिस्मों के- अन्तर्राष्ट्रीय भूगोल का ज्ञाता बन आदिवासी सौंदर्य शास्त्र पर- भाषण तैयार करने में जुटा है कुम्हार के घूमते चाक पर- कुशल उॅंगलियों से आकार लेती मिट्टी- पुरा संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है- और मिट्टी के माधों, अपसंस्कृति का- चश्मा लगाये- कला पारखी होने का ढोंग करने में व्यस्त हैं- नियान लाइट/चमगादड़ों में फंसा-चाॅंद/सूरज पूर्ववत बैसाखी लगे विचारों से- अपनी मूक छटपटाहट........व्यक्त करने में लगा है, .......मात्र ...छटपटाहट।
आपके दो कहानी संग्रह -- चन्दनवन की राख , तथा द्रोणाचार्य का क्लोन प्रकाशित हो चर्चित हो चुके हैं , ‘ इस प्रकार, हिन्दी साहित्य को, भोलानाथ त्यागी का अवदान महत्वपूर्ण है।


Saturday, December 22, 2012

घने कोहरे में -

कांपता सूरज , तलाशता है -

अलाव / कुछ इसी अंदाज में -

मानो ,कोई पदमनी

दर्पण तलाशती हो ,

या फिर -

न्याय , ढूंढ रहा हो

अपनी खोई / तुला

राजनीति के जंगल में

बेबस बिसुरता हुआ -

और / न्याय - मूर्ती ,

व्यस्त होँ

लेगपीस चबाने में ,

हलाल हो चुके /

न्याय का ,

क्योंकी ,मूर्ति पर सदा से -

चढ़ावा चढ़ाया जाता रहा है ,....

बेचारा सूरज ........

तलाश रहा है - अलाव ,

----- भोलानाथ त्यागी ,

49 /1 ,इमलिया परिसर

सिविल लाइंस , बिजनौर - 246701

मोबा - 09456873005

Monday, April 23, 2012

अपेक्षा
तुम मझे खून दो-
मैं तुम्हें आजादी दूंगा,
का उद्घोष आज
बदल गया है,।
लोकतन्त्र में खुलेआम-
धिक्कार एंव थू-थू हो रही है,
बेंचारा मतदाता/अपनी नियति देख
सिहर रहा है,
तुम हमें वोट दो-
हम तुम्हारा खून पियेगें,
की भावना लिये,
वोटों के खूंखवार शिकारी
व्यस्त हैं, घात लगाने में
और ‘सत्यम’ के ‘असत्य’-
सामने हैं,
तथाकथित बुद्धिजीवि का चिंतन,
भूखा बिलबिला रहा है,
बेसिक षिक्षा पोलियो ग्रस्त है
एंव उच्च षिक्षा-
लाला की तिजोरियों में
शीर्षासन कर रही है
षिक्षण सस्ंथान/
व्यवसायिक परिसर में-
बदल चुके हैं-
मंचो से मधुर स्वर में
गुनगुनाये जाते शब्द,
कविता मान लिये जाते हैं
जबकि ‘कविता’
गांव के जीर्ण-क्षीर्ण विद्यालय में
मिड-डे-मील अपनी थाली में संजोये
दलिये और खिचड़ी में तिरते
कीडे बीन रही है,
और यह कीडे/सारी व्यवस्था में
गिजबिजा रहें है
सठियाये लोकतन्त्र की यह-
उपलब्धि-,
गर्व का विषय है/अथवा शर्म का
इसमें उलझी
नेताजी सुभाष की भावना
का चीत्कार, बहरे हो चुके कानों तक
यदि सुनाई दे सका-
तो आज का दिन सार्थक होगा,
अन्यथा/कविता तो
पूर्वक्त भूखी ही सो जायेगी
अपनी निराषा के साथ
- भोलानाथ त्यागी

Sunday, January 8, 2012

लघु कथा



बलि का बकरा

- भोलानाथ त्यागी

चुनाव घोषित हो चुके थे , राजनीति चरम पर थी | सभी दल , अपनी -अपनी ढपली बजाने में व्यस्त थे | दल-बदल का मौसम , शवाब पर था |
और इस सब के बीच , जनता की छाती पर , मूँग दलने की एक बार फिर भरपूर तय्यारी थी |
तभी , रामदीन बोला -
"....... ससुर क्या जमाना आ गया है ? ......गिरगिट अपने चमत्कार दिखाने में , फिर इन्द्रधनुषी हो चले हैं ......लकिन इन नेताओं के सामने तो वह भी फेल हैं | "
तभी एक समाचार उछला -
" .......मूर्तियों पर पर्दा डाला जायेगा ....| "
रामदीन बुदबुदाया -
" ............पर्दा तो इन नेताओं की बुद्धि पर पहले ही पड़ चुका है ......जनहित पर पर्दा डाला जा चुका है ........
मूर्तियों पर पर्दा डालने से क्या होगा ....? पर्दा तो इस वाहियात राजनीति पर डालना चाहिए , ...साले...जनता को मूर्ख बनाते हैं |
.......अब इन पर्दों से कुछ नहीं होने वाला है .....जनता तो शैतानी पंजे की मजबूत गिरफ्त में छटपटा रही है , हमेशा कुरुर राजनीति की भेंट चढ़ती रहेगी
.....इस हांके में जनता, तो बलि का बकरा मात्र है .... | "
चुनावी मैदान में , शिकार की बिसात बिछ चुकी थी |
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भोलानाथ त्यागी
विनायकम , इमलिया परिसर ,
सिविल लाइन्स , बिजनौर - 246701
मोब - 09456873005