माँ
माँ- आज भी टहलती है,
रात भर/आंगन में-
चादंनी बन,
रसोई में रची-बसी है माँ-
बघार की गंध के साथ,
जब कभी हो जाता है, जुखाम/तो-
तुलसी की पत्ती और काली मिर्च वाली-
चाय में/माँ का- ममतामय चेहरा-
थिरकने लगता है,
जब कभी भी मैनें डाटां/नन्हे बेटे विनायक
को-
माँ ने- मुझे डाटा था-
क्योंकि माँ/ जब दादी बन जाती है-
तो ममता- अनायास बढ़ जाती है उसकी-
लगता है हर माँ-
देखती है, अपने बेटे को/ जीवन भर-
चदंन की गंध बन-
अगरबत्ती के धुऐं की तरह,
व्याप्त होती है- माँ-
हर दिच्चा मे/हर समय-
मां-सार्वमौम सत्य है,
प्रकृति का/जीवन धड कन का-
बघार की सौंधी महक-
और चदंन गंध सा,
कोमल अहसास है-
माँ।
बोनसाई संस्कृति
हमारा देच्च/संस्कृति-
अपनी अलग पहचान रखते थे,
सनातन काल से-
विच्च्वगुरु की गरिमा से विभूद्गिात-
आज अलंकृत है-
राजनीति के, गुरु घंटालो से,
सिद्वान्त और नैतिकता के
कंकालो से,
संस्कृति का बोनसाईकरण-
बलात, कर दिया गया है,
गमलों में उग रहे हैं-
वटवृक्ष,
सूत के कच्चे धागे-औ-
पीपल को छांव
चौपाल/हुक्का औ-गांव
इनका सैट, करोड ों रुपयेेेेेेेे खर्चकर
लगाया जाता है।
तब थिरकती है, नगंई-
बस, फिल्म हिट हो जाती है,
राद्गट्रभक्ति, 'गदर' का पर्याय बन-
चिघांड रही है/और सत्ता-
गगन विहार कर/चिरौरी में लगी है-
मवालियों की, लेकिन
बोनसाई वटवृक्ष, फिर भी
मुस्करा रहा है, क्योंकि-
कुछ भी सही/ है तो वटवृक्ष ही-
भले ही, बोनसाई हो.......।,

एक अच्छी कविता
ReplyDeleteThanks......
Deleteदोनों कविताएँ पठनीय हैं और विचारणीय भी । पर दिशा को दिच्चा लिखने की
ReplyDeleteक्या मजबूरी है ?