Tuesday, July 26, 2011

कविता


कैक्टस
राजनीति के जगंल में
उग रहें है-
मधु कोड़ा/
नरेन्द्र मोदी की मुस्कान लिये,
मायावी द्राान की मूर्तियों से सजे-
जुरासिक पार्क में विचरते,
डायनासोर रूपी भारी/भरकम-
नेतृत्व,
अपनी उगंली में पड ी, हीरे की अगूंठी-
सहला रहें हैं,
और देच्च का भविद्गय
अध्यापक/टाट- पट्टी विहीन-
विधालयों में,
मिड-डे-मील, भकोस रहा है
उसमें गिजबिजाते कीड े
अब सारी व्यवस्था में फैल गये हैं,
कैक्टस-
फूलों से भर गया है,
कैक्टस के फूूलों का यह-
समीकरण/च्चायद-
कैक्टस ही समझा पाये।

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