Wednesday, July 27, 2011

लघु कथा

समीकरण

विच्च्वविधालय की परीक्षाएं सम्पन होने के पच्च्चात, परीक्षा- परिणाम के विद्गाय में छात्र/छात्राओं मे स्वाभाविक जिज्ञासा बनी थी। राजीव ने अपनी चिन्ता को अभिव्यक्ति प्रदान करते हुए कहा था...... 'क्या बताएं इस बार तो काफी कठिन स्वाल आये थे, पास हो जायें, बस इतना ही बहुत है-।

..... क्यों चिंता करते हो यार, अपुन के नम्बर तो चकाचक आयेंगे- इस बार भी परीक्षा की कापियां कहां-कहां जंचने गई हैं... सारी जानकारी कर ली है- अटैची टूर करना है- और बस चाहो तो तुम भी साथ चलना-।

घनच्च्याम ने राजीव को आच्च्वस्त किया था।

इस आच्च्वस्ति के साथ ही च्चिक्षा की सार्थकता उजागर हो उठी थी। परीक्षा परिणाम का यह समीकरण अपने औचित्य पर, स्वयं एक प्रच्च्न-चिन्ह बन गया लगता था।

''पिकनिक''
पतित पावनी गंगा अपनी अविराम गति से बह रही थी। पिकनिक मनाने आई पार्टी जल-क्रीडा मे मग्न थे। सुरा प्रेमियों ने अपनी बोतलें ठडें पानी में, पत्थरों से टिकाकर सहेज दी। सामने थोड़ी दूरी पर एक युवती अपने बच्चे के साथ गंगा स्नान में व्यस्त थी। अनायास अबोध बच्चे का हाथ नहाते समय छूट गया-वह डूबने लगा और माँ की पुकार से पिकनिक पार्टी का ध्यान भंग हो गया।

बच्चा बचा लिया गया। माँ ने अपने गीले आंचल में उसे छिपा लिया, वह हाथ जोड कर जीवनदाता का धन्यवाद ज्ञापित कर रही थी। पिकनिक पार्टी का ध्यान युवती के मदमाते यौवन पर जा टिका, बोतल में बंद सुरा, प्रेमियों के पेट में कभी की उतर चुकी थी। टेपरिकार्डर पर पॉप संगीत बज रहा था, तभी एक सुझाव उभरा- ''........... अमा यार........... सामने देख........... क्या गजब चीज हैं.... पिकनिक रंगीन हो जाएगी... बस जरा सी....हिम्मत की बात है....।''

और, युवती, क्रूर बलात्कार का च्चिकार बन गई। बच्चा, रेत पर पड ा, बरबस रोता रहा। जीवनदाता, सहित, संपूर्ण मित्र मंडली अपना धन्यवाद, ग्रहण कर चुकी थी। पतित पावनी, मूक बनी पूर्ववत बहती रही।

-भोलानाथ त्यागी

No comments:

Post a Comment