Sunday, July 31, 2011

लघु कथा

बरगद की छाया

बूढ़ा बरगद जर्जर हो चुका था, हवा का तेज झोंका,उसे कोई न कोई आघात दे ही जाता। फिर भी, उसका अस्तित्व, तपती दोपहरी में, चन्दन-सी द्राीतलता का आभास कराने हेतु पूर्ण समर्थ था। उसके नीचे, अब पथिक सुस्ता लेते। पक्षियों का कलरव, उस उपेक्षित एकान्त की नीरवता को, सहज ही भगं करता रहता।

एक दिन अचानक, समय के झोंको ने, आंधी का रूप धारण कर लिया-उसनें बरगद का जर्जर अस्तित्व चरमराने लगा, और देखते ही देखते, वह धराच्चायी हो गया। उस दिन, पक्षियों का कलरव द्राांत था, पथिक बेबस आगें बढ जाते। बरगद के घराच्चायी होने का, कम्पन संवेदनशील धरती में, दूर तक महसूस हुआ था।

उस स्थान पर, बरगद की छाया की कल्पना ही, एक अव्यक्त द्राीतलता दे जाती, पथिक, अब भी वहां सहज ही ठिठक जाते, तथा पल भर को पक्षी, अनायास वहां चहचहाने लगते। बरगद की छाया, एक अतीत बन चुकी थी, लेकिन उस स्थान की पहचान, अभी भी बरगद से जुड ी थी। बरगद-हां, कतिपय मानवीय व्यक्तित्व भी बरगद की छाया का ही पर्याय होते हैं-जो साक्षात्‌ न रहकर भी, अपना अस्तित्व बनाये रखते हैं।

- भोलानाथ त्यागी

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