पीवड़ा
रेत की छाती पर पड ी लकीर,ें हवा से बन बिगड रही थीं। राजमार्ग के किनारे, इसी राजस्थानी परिवेच्च में, ढाबे पर अनेकों ट्रक एक कतार में खड े थे। ड्राइवर/क्लीनर अपने विच्चिद्गट अंदाज में बैठे बतिया रहे थे। एक स्थानीय समाचार पत्र का पृद्गठ रेतीली हवा के झोकों से रह.रह कर, सामने टेबिल पर पड ा फडफड ा रहा था। समाचार का द्राीर्पक .'पीवड ा ने तीन व्यक्तियों को मौत की नींद सुलाया' पढ कर एक पाठक ने कहा.'........सा...े...ला...पीवड ा भी कैसा दुच्च्मन है........सोते आदमी की छाती पर रात को चुपचाप बैठ जाता है....... सांस के द्वारा सारा जहर आदमी के अन्दर पहुंचा देता है...........सांप है या मौत का फरिच्च्ता...?।'
यह सुन कर एक अन्य व्यक्ति सहज ही चहक उठा-'क्यों साहब-पीवड ा तो आखिर सांप है...... और सोते आदमी की छाती पर बैठता है.......जबकि हमारे समाज में तो आजकल अनेकों पीवड ा जागते आदमी की छाती पर बैठे हैं......आरक्षण का पीवड ा.......साम्प्रदायिकता का पीवड ा.........भ्रद्गट्राचार का पीवड ा........ये सब अपना जहर घोल रहे हैं..........और आप रेगिस्तान के मामूली से सांप, पीवड ा की पीड ा से त्रस्त हैं'।
इस कथन से पीवड ा का भय, और भी अधिक व्याप्त हो गया था।
- भोलानाथ त्यागी
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