Monday, July 25, 2011

कविता


अपेक्षा
तुम मझे खून दो-
मैं तुम्हें आजादी दूंगा,
का उद्‌घोद्गा/आज
बदल गया है,।
लोकतन्त्र में खुलेआम-
धिक्कार एंव थू-थू हो रही है,
बेंचारा मतदाता/अपनी नियति देख
सिहर रहा है,
तुम हमें वोट दो-
हम तुम्हारा खून पियेगें,
की भावना लिये,
वोटों के खूंखवार च्चिकारी
व्यस्त हैं, घात लगाने में
और 'सत्यम्‌' के 'असत्य'-
सामने हैं,
तथाकथित बुद्धिजीवि का चिंतन,
भूखा बिलबिला रहा है,
बेसिक च्चिक्षा पोलियो ग्रस्त है
एंव उच्च च्चिक्षा-
लाला की तिजोरियों में
द्राीद्गर्ाासन कर रही है
च्चिक्षण सस्ंथान/
व्यवसायिक परिसर में-
बदल चुके हैं-
मंचो से मधरु स्वर में
गुनगुनाये जाते द्राब्द,
कविता मान लिये जाते हैं
जबकि 'कविता'
गांव के जीर्ण-च्चीर्ण विधालय में
मिड-डे-मील/अपनी थाली में संजोये
दलिये और खिचड़ी में तिरते
कीड े बीन रही है,
और यह कीड े/सारी व्यवस्था में
गिजबिजा रहें है
सठियाये लोकतन्त्र की यह-
उपलब्धि-,
गर्व का विद्गाय है/अथवा द्रार्म का
इसमें उलझी
नेताजी सुभा की भावना
का चीत्कार, बहरे हो चुके कानों तक
यदि सुनाई दे सका-
तो आज का दिन सार्थक होगा,
अन्यथा/'कविता' तो
पूर्वक्त भूखी ही सो जायेगी
अपनी निराच्चा के साथ
- भोलानाथ त्यागी

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